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सर्वकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 357, कुल 699 में से

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पृष्ठ 357

का० ३, अ० १, ब्रा० ३, कं० १६-२५ शतपथब्राह्मण / ३३६
एक बार एक यजुः-मन्त्र पढ़कर लगाता है और दो बार चुपचाप । इस प्रकार बाईं आँख को
बड़प्पन दे देता है ॥१६॥
यह पाँच बार क्यों लगाता है ? इसका कारण यह है कि यज्ञ और संवत्सर एक-से हैं ।
संवत्सर में पाँच ऋतुएँ होती हैं । इस प्रकार वह पाँच बार लगाने से संवत्सर को पा लेता है ।
इसलिए पाँच बार लगाता है ॥१७॥
अब यह इसको दर्भ के पवित्रा से पाक करता है। मनुष्य झूठ बोलने से अपवित्र हो
जाता है । पवित्रा पाक है। वह सोचता है कि 'पाक होकर दीक्षा लूँ।' दर्भ शुद्धि का साधन है।
वह सोचता है कि 'पवित्र होकर दीक्षा लूँ।' इसलिए दर्भ के पवित्रा से अपने को शुद्ध करता
है ॥१८॥
यह (दर्भ का पवित्रा) एक ही हो। यह पवन भी तो एक ही है, और पवन के ही लक्षण
का यह पवित्रा है (पवन का अर्थ भी पवित्र करनेवाला है), इसलिए दर्भ एक ही होना
चाहिए ॥१९॥
या तीन पवित्रा हों । यह पवन तो एक ही है, लेकिन पुरुष के शरीर में पहुँचकर प्राण,
व्यान और उदान बन जाता है । पवित्रा का भी यही लक्षण है। इसलिए तीन पवित्रा हो सकते
हैं ॥२०॥
ये सात भी हो सकते हैं। सिर के प्राण सात हैं, इसलिए सात हो सकते हैं। ये सात के
तिगुने अर्थात् २१ भी हो सकते हैं। पूर्णता इसी में है ॥२१॥
सात पवित्रों से वह यह मन्त्र पढ़कर पवित्र करता है—"चित्पतिर्मा पुनातु" (यजु०
४।४) । 'चित्पति' का अर्थ है प्रजापति, अर्थात् प्रजापति मुझे शुद्ध करे । "वाक्पतिर्मा पुनातु"
(यजु० ४।४) । 'वाक्पति' भी प्रजापति है, अर्थात् प्रजापति मुझे पवित्र करे । "देवो मा सविता
पुनात्वच्छिद्रेण पवित्रेण" (यजु० ४।४) । 'सुपूत' (अर्थात् यथार्थ शुद्ध) वह है जिसको सविता
देव ने शुद्ध किया हो । "अच्छिद्रेण पवित्रेण" (यजु० ४।४), क्योंकि वायु ही छिद्ररहित पवित्र
करनेवाला है । "सूर्यस्य रश्मिभिः" (यजु० ४।४), क्योंकि सूर्य की किरणें सबसे अधिक पवित्र
करनेवाली हैं ॥२२॥
"तस्य ते पवित्रपते" (यजु० ४।४)—"वह (जो दीक्षित पुरुष है) पवित्रता का पति है।"
"पवित्रपूतस्य" (यजु० ४।४), क्योंकि वह पवित्रा से शुद्ध किया हुआ है। "यत् कामः पुने
तच्छकेयम्" (यजु० ४।४), अर्थात् "जिस कामना से मैं पवित्र हुआ हूँ वह कर सकूँ" अर्थात् यज्ञ
को पा सकूँ ॥२३॥
अब वह आशीर्वाद का मन्त्र बोलता है—"आ वो देवासऽईमहे वामं प्रयत्यध्वरे । आ वो
देवासऽआशिषो यज्ञियासो हवामहे" (यजु० ४।५)—"हे देवो, हम आपका यज्ञ के आरम्भ में
आवाहन करते हैं। हे देवो, हम आपका यज्ञ में आशीर्वाद के लिए आवाहन करते हैं।" इस प्रकार
ऋत्विज लोग अपने आशीर्वाद को उसके लिए देते हैं ॥२४॥
अब वह अँगुलियों को यह मन्त्र पढ़कर भीतर की ओर मोड़ता है—"स्वाहा यज्ञं मनसः"
(यजु० ४।६) । इस मन्त्र से दो छोटी अँगुलियों को । "स्वाहोरोरन्तरिक्षात्" (यजु० ४।६) ।
इससे दो अनामिकाओं को । "स्वाहा द्यावापृथिवीभ्याम्" (यजु० ४।६) । इससे दो बीच की
अँगुलियों को । "स्वाहा वातादारभे" (यजु० ४।५) । इससे दोनों मुट्ठियाँ बाँधता है। जैसे डंडा
या कपड़ा पकड़ा जाता है उसी प्रकार प्रत्यक्ष रीति से यज्ञ नहीं पकड़ा जा सकता है। जैसे देव
परोक्ष हैं, वैसे ही यज्ञ परोक्ष है ॥२५॥