शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 329, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० २, अ० ६, ब्रा० १, कं० ३३-४० शतपथब्राह्मण / ३११
आवाहन करके सूंघते हैं, खाते नहीं। परन्तु आसुरि की सम्मति है कि 'हमारा विचार है कि जो
कुछ अग्नि में डाला जाय उसका कुछ भाग खाना भी चाहिए' ।।३३।।
अब जो हवि देनेवाला हो, चाहे अध्वर्यु, चाहे यजमान, वह पानी का बर्तन लेकर तीन
बार दाहिनी से बाईं ओर को पानी छिड़कता हुआ चलता है। वह यजमान के (पितरों के) लिए
'असौ अवनेनिक्ष्व' (आप धोवें) इस प्रकार दो बार कहकर पानी डालता है, और 'आप धोवें,
आप धोवें' कहकर बाबा (पितामह) के लिए (दक्षिण-पश्चिमी कोने में), फिर परबाबा
(प्रपितामह) के लिए 'आप धोवें, आप धोवें' कहकर दक्षिण-पूर्वी कोने में। जैसे अतिथि को
सत्कार के लिए जल देते हैं उसी प्रकार यहाँ भी ॥३४॥
अब पुरोडाश में से एक टुकड़ा काटकर बायें हाथ में लेता है। धानों में से भी एक भाग
काटकर बायें हाथ में लेता है, और मन्थ में से भी एक टुकड़ा काटकर बायें हाथ में लेता
है ॥३५॥
अब वह अवान्तर दिशा के सामने (उत्तर-पश्चिम की ओर) यजमान के बाप के लिए
देता है, यह कहकर कि 'यह तुम्हारे लिए', और इस अवान्तर दिशा के सामने (दक्षिण-पश्चिम
की ओर) यजमान के बाबा के लिए, यह कहकर कि 'यह तुम्हारे लिए।' और इस अवान्तर दिशा
के सामने (दक्षिण-पूर्व की ओर) यजमान के परबाबा के लिए यह कहकर कि 'यह तुम्हारे लिए।'
और इस अवान्तर दिशा के सामने (उत्तर-पूर्व की ओर) इस मन्त्र से हाथ धोता है—"अत्र
पितरो मादयध्वं यथाभागमावृषायध्वम्" (यजु० २।३१)—'हे पितरो यहाँ खाओ, बैल के समान
अपने-अपने भागों को।' इसका तात्पर्य यह है कि 'आप अपना-अपना भाग खाइये।' वह इस
प्रकार पितरों को क्यों खिलाता है ? इसलिए कि अपने पितरों को यज्ञ से वंचित नहीं
करता ।।३६।।
अब वे सब यज्ञोपवीत धारण किये हुए उत्तर की ओर जाकर आहवनीय के (उत्तर को)
खड़े होते हैं। जो आहिताग्नि होकर दर्श-पूर्णमास यज्ञ करता है वह देवों का निकटवर्ती होता है।
परन्तु ये अभी पितृ-यज्ञ कर रहे थे, इसलिए अब ये देवों को सन्तुष्ट करते हैं ॥३७॥
अब वे इन्द्र-सम्बन्धी दो मन्त्रों को पढ़कर आहवनीय के पास खड़े होते हैं—"अक्षन्न्मीम-
दन्त ह्यव प्रियाऽअधुषत । अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजा न्विन्द्र ते हरी ॥ सुसंदृशं
त्वा वयं मघवन् वन्दिषीमहि । प्र नूनं पूर्णबन्धुर स्तुतो यासि वशाँ२ऽअनु योजा न्विन्द्र ते हरी"
(यजु० ३।५१,५२ या ऋ० १।८२।२,३)—“प्यारों ने खा लिया, वे सन्तुष्ट हो गये और
उन्होंने अपने को झाड़ डाला। प्रकाशयुक्त विप्रों ने स्तुति की – हे इन्द्र ! अपने दोनों घोड़ों को
जोत। हे इन्द्र, तुझ उत्तम की हम स्तुति करेंगे। इस प्रकार स्तुति किया गया तू अपने रथ में
हमारी इच्छा के अनुसार आ। हे इन्द्र ! तू अपने दोनों घोड़ों को जोत" ।।३८॥
अब वे गार्हपत्य तक लौटते हैं और खड़े होकर इन मन्त्रों को पढ़ते हैं—"मनो न्वाह्वामहे
नाराशंसेन स्तोमेन । पितॄणां च मन्मभिः ।। आ नऽएतु मनः पुनः क्रत्वे दक्षाय जीवसे । ज्योक्
च सूर्य दृशे ।। पुनर्नः पितरो मनो ददातु दैव्यो जनः । जीवं व्रातं सचेमहि।" (यजु० ३।५३,
५४, ५५ या ऋग्वेद १०।५७।३,४,५)—“हम नाराशंसी स्तोम के द्वारा मन का आवाहन करते
हैं, और पितरों के स्तोम से। हमारे पास बुद्धि, शक्ति और जीवन के लिए मन फिर आवे कि
हम बहुत दिनों तक सूर्य के दर्शन करें। हे पितरो, देव्य जन हम को फिर मन दें कि हम जीवित
लोगों के साथ रह सकें।" अब तक वे पितृ-यज्ञ कर रहे थे। अब वे फिर जीवन को लौटते हैं।
इसीलिए कहा – 'हम जीवित लोगों के साथ रह सकें' ॥३९॥
अब जिसने पिण्ड दिया था वह फिर दाहिने कन्धे पर जनेऊ रखकर यह मन्त्र जपता