शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 42, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें३८ ] [ श्रीशारदा तिलक
चतुर्द्धा पञ्चधा वा स्युः (ऽथ) स मन्त्रश्छिन्नसंज्ञकः ।
आदिमध्यावसानेषु भूबीजद्वन्द्व लाञ्छितः ।७२
रुद्धमन्त्रः स विज्ञेयो भुक्तिमुक्तिविवर्जितः ।
मायात्रितत्वश्रीबीजरावहीनस्तु योमनुः ।७३
शक्तिहीनः स कथितो, यस्य मध्ये न विद्यते ।
कामबीजं मुखे माया शिरस्यङ्कुशमेव वा ।७४
असौ पराङ् मुखः प्रोक्तो, हकारो विन्दुसंयुतः ।
आद्यन्तमध्येष्विन्दुर्वाद्वौ नाभावेद्वधिरः स्मृतः ।७५
जिस मन्त्र के अन्त में-मध्य में और आदि में अनिल बीज कहा
जाता है, संयुक्त हो अथवा वियुक्त हो तीन प्रकार से स्वर क्रान्त होवे
अथवा चार या पाँच प्रकार से होवे, वह छिन्न संज्ञा वाला हुआ
करता है। जो आदि मध्य और अवसान के भूबीज के इन्द्र से लाञ्छित
होता है वह मन्त्ररुद्ध समझना चाहिए। जो भुक्ति और मुक्तिसे रहित
हुआ करता है। जो माया-त्रितत्व-श्रीबीज से अवहीन मन्त्र होता है
वह शक्तिहीन कहा गया है। जिसके मध्य में काम बीज नहीं होता है-
मुख में माया ओर शिर में अंकुश नहीं है वह मन्त्र पराङ्मुख कहा
गया है। बिन्दु से संयुक्त हकार अथवा आदि-अन्त और मध्य में इन्दु
नहीं होता है, वह बधिर कहा गया है ।७१-७५।
पञ्चवर्णोमनुर्यः स्याद्रेफार्केन्दुविवर्जितः ।
नेत्रहीनः स विज्ञेयोदुःखशोकभयप्रदः ।७६
आदिसध्यावसानेषु हंसः प्रासादवाग्भवौ ।
हकारो बिन्दुभाञ्जीवो रावश्चापि चतुष्कलम् ।७७
माया नमामि च पदं नास्ति यस्मिन्स कीलितः ।
एक मध्ये द्वयं मूर्द्धनि यस्मिन्नस्त्रपुरन्दरौ ।७८
न विद्यते, स मन्त्रः स्यात्स्तम्भितः सिद्धिरोधकः ।
वह्निवायु॑समामुक्तो यस्य मन्त्रस्य मूर्द्धनि ।७९