सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 31

श्री शारदा तिलक ] २७
अग्निषीमात्मकास्ते स्युः शिवशक्तिमयाद्रवेः ।
येन संभवमापन्नाः सोमसूर्याग्निरूपिणः ॥११७
वह विभु शब्द ब्रह्ममयी कुण्डलिनीको प्रमूत करती है। उससे निरो-
धिका शक्ति होती है फिर उसने ध्वनि होती है और उससे नाद हुआ
करता है ।१११। फिर उससे अर्धेन्दु होता है फिर बिन्दु फिर उससे परा
होती है। पश्यन्ती मध्यमा, वाणी में वैखरी शब्दों के जन्म का स्थान
है। यह इच्छा-ज्ञान और क्रिया के स्वरूप वाली गुणात्मिका तेजके रूप
वाली है। इसी क्रम से कुण्डली वर्णों की माला का सृजन किया करती
है ।११२-११३। वह अकार के आदि से लेकर सकार के अन्त तक बया-
लीस वर्णों के स्वरूप वाली होती है ।११४। उन वर्णों से अभिन्न कला
क्रम से रुद्रादिक को प्रसूत करती है । दन्हि निरोधिका होती है और
अर्धेन्दु निशाकर होता है ।११५। दोनों के योग में विन्दु के स्वरूप वाला
तेजों की निधि सूर्य होता है। क्योंकि इस शिव-शक्ति के भय से वर्ण
समुत्पन्न हैं ।११६। वे शिव शक्ति के स्वरूप वाले रवि से अपनी
षोमात्मक होते हैं। जिससे सोम-सूर्य और अग्नि के रूप वाले सम्भव
हुए हैं ।११७।
॥ द्वितीय पटल ॥
ततो व्यक्तिं प्रवक्ष्यामि वर्णानां वदने नृणाम् ।
प्रेरिता मरुता नित्यं सुषुम्णारन्ध्रनिर्गताः ॥१
काण्ठादिकरणैर्वर्णाः क्रमादाविर्भवन्ति ते ।
एषु स्वराः स्मृताः सौम्याः स्पर्शाः सौराः शुभोदयाः ॥२
आग्नेया व्यापकाः सर्वेसोमसूर्याग्निदेवताः ।
स्वराः षोडश विख्याताः स्पर्शास्ते पञ्चविंशतिः ॥३