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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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श्री शारदा तिलक ] २६
त्रिगुणीकृतसर्वाङ्गी चिद्रूपा शिवगेहिनी ।
प्रसूते त्रैपुरं मन्त्रं शक्तिविनायकम् । ६३
पाशाद्यं त्र्यक्षरं मन्त्रं त्रैपुरं चण्डनायकम् ।
सौरं मृत्युञ्जयं शक्ति शाम्भवं विनतासुतम् । ६४
वागीशीत्र्यक्षरं मन्त्रं नीलकण्ठं विषापहम् ।
यन्त्रं त्रिगुणितं देव्या लोकत्रयगुणत्रयम् ६५
जिस समय में वह संवित् द्विगुणी कृत विग्रह वाली होती है तो
वासर के क्षय में हसवर्ण परात्मा शब्दार्थोका यह सृजन करती है। यह
परा देवी उस समय में प्रकृति और पुरुष का सृजन किया करती है ।
जो-जो भी इस जगत् मे है वह युग्म उत्पन्न होता है ।६१-६२। यह
चिद्रूपा अर्थात् चैतन्यके स्वरूप वाली शिवकी गृहिणी त्रिगुणी कृत सब
अङ्गो वाली होकर त्रैपुर मन्त्रों और शक्ति विनायक मन्त्र को प्रसूत
किया करती है ।६३। पाशाद्य तीन अक्षरों वाला मन्त्र है और त्रिपुर
चण्डनायक मन्त्र है । सौर-मृत्युञ्जय शक्ति-शाम्भव-विनतासुत
वागीशी-ये तीन अक्षरों वाला मन्त्र है। नीलकण्ठ विष के अपहरण
करने वाला होता है । देवी का त्रिगुणित मन्त्र होता है। लोक तीन हैं
और गुण तीन हैं ।६४-६५।
धामत्रयं सा वेदानां त्रयं वर्णत्रयं शुभा ।
त्रिपुष्करं स्वरान्देवी ब्रह्मादीनां त्रयं त्रयम् । ६६
वह्नेः कालत्रयं शक्तित्रयं वृत्तित्रयं मतम् ।
नाडीत्रयं त्रिवर्गं सा यद्यदन्यत् त्रिधा मतम् । ६७
चतुःप्रकारगुणिता शाम्भवी शर्मदायिनी ।
तदानीं पद्मिनीबन्धोः करोति चतुरक्षरम् । ६८
चतुर्वर्णं महादेव्या देवीतत्त्वचतुष्टयम् ।
चतुरः सागरात्तन्तःकरणानां चतुष्टयम् । ६६
सूक्ष्मादींश्चतुरो भावान् विष्णोर्मूर्त्तिचतुष्टयम् ।
चतुष्टयं गणेशानामात्मादीना चतुष्टयम् । ७०