शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 203, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवम पटल ] [ २०३
कथित परिमाण वाला वृत्त बनाकर पूर्व—पश्चिम में सूत्र को स्फालित
करके उनके अग्रभागों में सूत्र को अधिष्ठित करे। वृत्तके अर्ध परिमाण
वाले सूत्र से दो मत्स्य बनावे। ऐसा करने पर चार मत्स्य निष्पन्न होते
हैं। पूर्व और पश्चिम के दो—मत्स्यों में दक्षिणोत्तर में रहने वाले
दोनों सूत्रों का आस्फालित करे। इत्यादि रीति से सम्पुटित करने पर
वह्निपुर द्वय होते हैं। शक्ति बीज के अन्दर स्थित साध्य और साधक
के कर्म का नाम पूर्व की ही भाँति लिखे। पाँच प्रकार से रमा, माया
और मन्मथ से वीत होवे। रस पुट में अपने नाम से संयुक्त तीन बीज
लिखे। ऊर्ध्वभाग में विन्दु के सहित तीन बीजों का लेखन करना
चाहिये। ईकारगत ऊर्ध्वभाग तीन कोणों में साधक नाम वाले विन्दु
सहित तीन बीजों को लिखे कोणान्तर के अग्र प्रदेश में ईम्—यह लिखे।
हरिहरै वद्ध गण्डम्—यहाँ पर गण्डशब्द से षट् कोश कोण के दोनों पार्श्व
भाग कहे जाते हैं। ूर्व की ही भाँति हरिहिर वर्णों को लिखना
चाहिए। षड्माया बीजोंसे अनुबद्ध सन्धि—इससे एकान्तरित सन्धि वन्ध
विवक्षित होता है ।५३। चिन्तामणि और नृसिंह से शोभित इस कोण
को लिखे। यह दिव्य षड्गुणित मन्त्र सब प्रकार की सिद्धियों के प्रदान
करने वाला है ।५४। अग्नि के बारह कोणों में स्थित व्याहृतियों से
वृत्त लिखे और लिपि के युगों से आबद्ध गण्ड अनन्तर में दोर्ग बीज
का लेखन करे। गाय के घीसे कोणाग्र के बाहिर स्थापित द्वादश शक्ति
बीजों से बद्ध विवर त्रिष्टुत् से वृत्त करे और भूपुर युग में मातृका से
वीतससिंह चिन्तामणि का लेखन करना चाहिए ।५५। यह द्वादश
गुणित मन्त्र बताया गया है जो रक्षा और प्रसिद्धि का देने वाला है।
यह सब तरह के सौभाग्य को उत्पन्न करने वाला और समस्त शत्रुओं
के निवारण करने वाला होता है ।५६।
लिखेत्सरोजं रसपत्रयुक्तं मध्ये दलेष्वप्यभिलिख्य मायाम् ।
स्वरावृतं यन्त्रमिदं वधूनां पुत्रप्रदं भूमिगृहान्तरस्थम् ।५०