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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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श्री शारदा तिलक
प्रथम पटल
शब्दब्रह्म यदूचिरे सुकृतिनश्चैतन्यतर्गतम् ।
तद्बोऽव्यादर्निशं शशाङ्कसदनं वाचामधीशं महः । १
अन्तःस्मितोल्लसितमिन्दुकलावतंस-मिन्दीवरोदरसहोदरनेत्रशोभि।
हेतुस्त्रिलोकविभवस्य नवेन्दुमौले-रन्तःपुरं दिशतुमंगलमादराद्वः ।२
संसारसिन्धोस्तरणैकहेतून्दधे गुरून्मूर्द्धिन शिवस्वभावान् ।
रजांसि येषां पदपङ्कजानां तीर्थाभिषेकश्रियमावहन्ति ।३
सारं वक्ष्यामि तन्त्राणां शारदातिलकं शुभम् ।
धर्मार्थकाममोक्षाणां प्राप्तेः प्रथमकारणम् ।४
शब्दार्थसृष्टिर्मुनिभिश्चन्दोभिर्देवैतैः सह ।
विधिश्च यन्त्रमन्त्राणां तन्त्रेऽस्मिन्नभिधीयते ।५
जिसको सुकृती गण अन्तर्गत चैतन्य को शब्द ब्रह्म कहते थे वह
शशांक सदन-वाणियों का अधीस तेज आपकी निरन्तर रक्षा करे ।१।
अन्तर में स्मित से उल्लासित-इन्दु (चन्द्र) की कला के भूषण वाले-
इन्हीं वरके उदर के सहोदर नेत्रों की शोभा से समन्वित-तीनों लोकों के
वैभव के कारण ऐसे भवेन्दु मौलि (शिव) का अन्तःपुर आदर से
आपका मङ्गल करे ।२। संसार रूपी सागर से सन्तरण करने के एक
हेतुभूत-शिव के स्वभाव वाले गुरुओं को मस्तक में धारण किया था।
जिनके चरणों कमलोंकी रजतीर्थों द्वारा हुए अभिषेक की श्री का आवा-
हन किया करते हैं ।३। उन तन्त्रों के सारस्वरूप इस परम शुभ