सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ सौन्दर्य लहरी
बीज से यही बात झलकती है कि तीनों स्तर शक्ति अथवा माया
के ही रूप हैं, जो ईश्वर के आश्रय से उदय अस्त होती रहती है ।
आदि शक्ति को वेदों में श्री संज्ञा दी गई है। इसलिए इस विद्या का
नाम श्री विद्या अर्थात ब्रह्म की श्री की विद्या प्रसिद्ध है जो
ब्रह्म विद्या ही है। देखे श्री सूक्त के १५ मंत्र । पंच-दशी में भी
१५ ही अक्षर हैं। कहा है:—
श्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्न्याऽहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि
रूपमश्विनौव्यात्तम्,....इत्यादि (यजुर्वेद)
अर्थात:—हे ईश्वर यह तेरी श्री लक्ष्मी तेरी पत्नि
है, जिसके दिन रात्रि पार्श्व हैं, नक्षत्र रूप हैं, जिससे सब व्याप्त है ।
श्री विद्या का एक रूप षोडशी विद्या भी प्रसिद्ध है, उसके भी
कामादि षोडशी, रमादि षोडशी, मायादि षोडशी, वागादि षोडशी,
तारादि षोडशी अवान्तर भेद हैं । ये भेद उस ही दृष्टि से समझे
जाने चाहिये । जिसने काम से सृष्टि मानी, उसने कामादि की
उपासना की । जिसने श्रीसे सृष्टि मानी उसने रमादि की, जिसने
माया से सृष्टि मानी उसने मायादि की और जिसने शब्द से सृष्टि
मानी उसने वागादि की उपासना की । तदनुसार उनके मंत्रों में
बीजों का क्रम भी भिन्न-भिन्न होता गया । ये सब मंत्र लोम-विलोम
क्रम से प्रभव और अप्यय उभयपर हैं।
श्री विद्या की उपासना अति प्राचीन है। शंकर भगवत्पाद
भी श्री विद्या के उपासक थे यह बात असंदिग्ध है ।