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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 415 में से

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पृष्ठ 84

४४ सौंदर्य लहरी
स्थान हृदय है और प्राण सबको प्रिय होते हैं। इसलिये प्राण प्रेम
भक्ति की पीठ है। अर्थात हृदय में प्रेम भक्ति का उदय होता है,
और प्रेम का भाव स्वयं ब्रह्म है। प्राण की सूक्ष्म गतिद्वारा वायु का
वेध होकर आकाश का वेध होता है। आकाश से श्रवणेन्द्रिय की
उत्पत्ति है जो अनंत की पीठ है। अनंत स्वयं ब्रह्म है। हृदय से
अहं भाव की भी स्फुरणा होती है। और अहं मे सत् की पीठ हैं
और सत् स्वयं ब्रह्म है। इस प्रकार ऐं और क्लीं दोनो से सब चक्रों
का वेध होकर ब्रह्म की प्राप्ति की जाती है। यह विज्ञान बृहदारण्यक
उपनिषत् के चतुर्थ अध्यायोक्त याज्ञवल्क्य—जनक संवाद के आधार
पर बताया गया है, देखें प्रथम ब्राह्मण। इसी प्रकार वाग्भव कूट को
समझना चाहिये। वाग्भव कामकला और शक्ति कूट जो ह्रीं
युक्त हैं और लक्ष्मी बीज जिसकी सोलहवीं कला है, पूरा
मंत्रराज बनता है।
श्लोक की प्रथम पंक्ति में कहा गया है कि शिव शक्ति से
स्पन्द ही शक्ति है युक्त होकर प्रभव करता है। —“नहि तया बिना
परमेश्वरस्य सृष्टृत्वं सिध्यति” (शंकर भास्य ब्र.सू.
१-४-३) उसके बिना परमेश्वर का सृष्टृत्व सिद्ध नहीं होता।
दूसरी पंक्ति में कहा है कि शिव शक्ति से युक्त न हो तो वह
स्पंदित भी नहीं हो सकता। इसका अर्थ यह है कि शक्ति से
युक्त ब्रह्म स्पंदित होता है। “तदेजति तन्नैजति” (ईश ५) वह
स्पंदित होता है और वह स्पन्द नहीं होता, ऐसा श्रुति कहती है।
अब यह बात विचारणीय है कि स्पन्द शक्ति का धर्म है या शिव
का अथवा दोनों का। स्वभाव से निष्क्रिय, शांत और निरंजन पद