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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 415 में से

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पृष्ठ 78

३८ सौंदर्य लहरी
कामना करता है। कामना से मन और मन में संकल्प* शक्ति का
उदय होता है, जिसको 'मनसोरेतस्' कहा गया है। देखें परिशिष्ट
नं. १ । संकल्पात्मिका शक्ति का स्थान मन है। रेतस् का अर्थ
शक्ति ही समझना चाहिये। इच्छा शक्ति मन के स्तर पर उतर कर
संकल्पात्मिका शक्ति में परिणत हो जाती है, अर्थात् संकल्पों की
शक्ति कामना अथवा वासना का स्थूल परिणाम है, और संकल्पों
का ही नाम मन है। कहा है:—
'संकल्पविकल्पात्मकं मनः'
इस स्तर पर मानो बीज अंकुरित होकर दोनों दल पृथक हो
जाते हैं. अहम् अपने को इदम् शक्ति का ईश्वर समझने लगता है।
यह तीसरा स्पन्द है, फिर शक्ति का परिणाम निम्न स्तरों पर होने
लगता है, वह चौथा स्पन्द है। तीसरे स्पन्द में मानों शिवजी
नेत्र खोल देते हैं, और उनको शक्ति के स्फुरण का पूर्ण ज्ञान हो
जाता है। अर्थात शक्ति और शक्तिमान दोनों की पृथक सत्ता का
ज्ञान उदय हो जाता है। शिवरूपी अहम् को महेश्वर तत्व और
'इदम्' को शुद्ध विद्या कहते हैं। शुद्ध विद्या की फिर सत् और
असत् दो स्तरों पर अभिव्यक्ति दिखने लगती है। सत् को सद्विद्या
और असत् को असद्विद्या भी कहा जा सकता है। शुद्ध विद्या में
सामान्य भाव है और सद्विद्या में विशेष भाव निहित है। असद्विद्या

  • संकल्प = मैं यह यह करूंगा (इदमिदं कुर्याम), • एसा मन
    का व्यापार संकल्प कहलाता है संकल्प में इदम् का ज्ञान विशेष रूप
    से रहता है।