सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 415 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 72

१२ · सौंदर्य लहरी
ढक गया । उसके महिमा रूप तप से एक पुरुष उत्पन्न हुआ, जिसने
सृष्टि के रूप में वर्तमान होने की इच्छा की । उसके मन से पहिले
शक्ति उत्पन्न हुई । बुद्धिमान ऋषियों ने हृदय की जिज्ञासा से जाना
के उस असत् में सत् का बन्धु था । मनकी शक्ति को यहां असत्
और उस एक पुरुष को सत् कहा गया है । अर्थात ऋषियों ने जब
सृष्टि के क्रम को जानने की इच्छा की तो ऐसा समझा कि पहिले
सत् और असत् का जोडा उत्पन्न हुआ । सृष्टि के पूर्व न सत् था न
असत् था । जो था वह ब्रह्म था । गीता में भी ब्रह्म का स्वरूप
ऐसा ही बताया गया है ।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ (गीता १३-१२)
अर्थात्:—अनादि परब्रह्म न सत् कहलाता है न असत् ।
सत् और असत् दोनों परस्पर विरोधी सापेक्षिक शब्द हैं । परब्रह्म
निरपेक्ष अक्षर अव्यय सत् असत् से परे हैं । सृष्टि के पूर्व उसके
अतिरिक्त कुछ भी न था । वह अकेला था । कोई जड प्रकृति या
भौतिक तत्व न थे । अर्थात् अव्यक्त अथवा प्रधान वाच्य जगत
का कारण जैसा कि कुछ लोग मानते हैं—न था । सब से पहिले
तम (अन्धकार) सा छा गया, यद्यपि उस समय न दिन का
प्रकाश था न रात्रि का अन्धकार । अर्थात् वह था महामाया का
प्रादुर्भाव । उस माया विशिष्ट ब्रह्म ने अपनी महिमा से ही तप
किया । उसका तप ज्ञानमय था ।
यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः (मु० १-९)
अर्थ:—जो सर्वज्ञ सर्ववित् है, उसका तप ज्ञान मय है ।