सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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ढक गया । उसके महिमा रूप तप से एक पुरुष उत्पन्न हुआ, जिसने
सृष्टि के रूप में वर्तमान होने की इच्छा की । उसके मन से पहिले
शक्ति उत्पन्न हुई । बुद्धिमान ऋषियों ने हृदय की जिज्ञासा से जाना
के उस असत् में सत् का बन्धु था । मनकी शक्ति को यहां असत्
और उस एक पुरुष को सत् कहा गया है । अर्थात ऋषियों ने जब
सृष्टि के क्रम को जानने की इच्छा की तो ऐसा समझा कि पहिले
सत् और असत् का जोडा उत्पन्न हुआ । सृष्टि के पूर्व न सत् था न
असत् था । जो था वह ब्रह्म था । गीता में भी ब्रह्म का स्वरूप
ऐसा ही बताया गया है ।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ (गीता १३-१२)
अर्थात्:—अनादि परब्रह्म न सत् कहलाता है न असत् ।
सत् और असत् दोनों परस्पर विरोधी सापेक्षिक शब्द हैं । परब्रह्म
निरपेक्ष अक्षर अव्यय सत् असत् से परे हैं । सृष्टि के पूर्व उसके
अतिरिक्त कुछ भी न था । वह अकेला था । कोई जड प्रकृति या
भौतिक तत्व न थे । अर्थात् अव्यक्त अथवा प्रधान वाच्य जगत
का कारण जैसा कि कुछ लोग मानते हैं—न था । सब से पहिले
तम (अन्धकार) सा छा गया, यद्यपि उस समय न दिन का
प्रकाश था न रात्रि का अन्धकार । अर्थात् वह था महामाया का
प्रादुर्भाव । उस माया विशिष्ट ब्रह्म ने अपनी महिमा से ही तप
किया । उसका तप ज्ञानमय था ।
यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः (मु० १-९)
अर्थ:—जो सर्वज्ञ सर्ववित् है, उसका तप ज्ञान मय है ।