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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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पृष्ठ 47

सौंदर्य लहरी ७
दीयते शिव सायुज्यं क्षीयते पाश बन्धनम् ।
अतो दीक्षेति कथिता बुधैःसच्छास्त्रवेदिभिः ॥
दीक्षा ३ प्रकार की होती है, १ आणवी, २ शाक्ति और ३
दीक्षा शाम्भवी । प्रथम आणवी दीक्षा में मंत्र दीक्षा द्वारा
श्रीचक्र के पूजन सहित कादि हादि विद्याओं में
प्रवेश कराकर, बहिर्पूजन में जो कर्म प्रधान है, साधक को दीक्षित किया
जाता है । अंतिम दोनों दीक्षाएं बेध दीक्षाएं कहलाती हैं, जिनमें
गुरु शिष्य पर शक्तिपात करके शिष्य की कुंडलिनी शक्ति को जागृत
कर देता है । शक्ति दीक्षा में षट्-चक्र के बेध द्वारा ग्रंथित्रय अर्थात
रुद्रग्रंथि, विष्णु ग्रंथि और ब्रह्म ग्रंथि का बेध किया जाता है ।
इसीलिये इसको बेध दीक्षा भी कहते हैं। अंतिम शांभवी दीक्षा में
जो तीव्रतम दीक्षा है, जीव ब्रह्मैकत्व ज्ञान का प्रस्फुटन होता है,
इसीलिये इसको महावेध दीक्षा भी कहते हैं ।
यह ऊपर कहा जा चुका है कि उपरोक्त दीक्षाएं गुरु के शक्तिपात
रूपी अनुग्रह के द्वारा ही संपादित होती हैं। शक्ति-
शक्तिपात पात दीक्षा में गुरु अधिकारी जिज्ञासु को स्पर्श,
अवलोकन, मंत्र देकर वाणी द्वारा अथवा संकल्प मात्र से अनुगृहीत
करता है; यदि शिष्य अपने को अनुगृहीत अनुभव न करे, तो
दीक्षा का होना न होने के तुल्य समझना चाहिये ।
श्री मच्छङ्कराचार्य ने सौंदर्य लहरी जैसा ग्रंथ लिख कर मानव
समाज पर बडी कृपा की है क्योंकि केवल वाचक ज्ञानियों को यह