सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 397, कुल 415 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 397

११
ष्ठान में लाता है तो उसकी कामना पूर्ण होती है और वह स्वयं
कामरूप हो जाता है। यहां कामबीज की ओर संकेत है।
परिस्रुतं झषमाजंफलं च भक्तानि योनीः सुपरिष्कृताश्च ।
निवेदयन्देवतायै महत्यै स्वात्मीकृते सुकृते सिद्धिमेति ॥१२॥
अर्थः- परिस्रुतं=मदिरा, झषं=मत्स्य, नागरवेल, आजं=
अजा से संबंध रखने वाला फल, अथवा आज्यं घी और फल
अथवा झषा नागबला से उत्पन्न होने वाला फल, भात भोजन
के पदार्थ, और योनियों को अच्छी तरह साफ सुथरा करके
महादेवी को नैवेद्य देकर अपने लिये किये हुए सुकृत से सिद्धि
पाता है। यह सारी विद्या सांगोपांग अति गोपनीय है, इसका
यंत्र, मंत्र, पूजन विधि और पूजन की सामग्री का वर्णन कूट
शब्दों में किया गया है। वास्तविक अर्थ सांप्रदायिक आचार्यों
के मुख से ही जाना जा सकता है। इसलिये नैवेद्य की सामग्री
के नाम भी कूट शब्दों में बताये हैं। जैसे परिस्रुतं मदिरा,
झषं मछली, आजंबकरे का मांस. योनि स्त्री की योनि इत्यादि
वास्तव में इन निषिद्ध पदार्थों के नामों द्वारा कूटशब्दों में
अध्यात्म निवेदन निहित है। उसको गुप्त रखा गया है। परि-
स्रुतं से कुण्डलिनी जागरणोपरान्त अनुभव में आने वाली
आध्यात्म मस्ती का संकेत है, झषमाजफलं से कर्मों का फल,
भक्तानि से प्रारब्ध भोग और योनी से उनकी कारण भूत
वासनायें समझनी चाहिये ।