सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
पृष्ठ 395, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ें९
कामो योनिः कामकला वज्रपाणिर्गुहाहसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः
पुनर्गुहा सकला मायया च पुरूच्येषा विश्वमातादिविद्या ॥८॥
अर्थः—कामः (ककार) योनिः (एकार) कामकला (ईकार)
वज्रपाणिःइन्द्र (लकार) गुहा (ह्रीं) हसा (हस) मातरिश्वा (ककार)
अभ्रं (इकार) इन्द्रः (लकार) पुनर्गुहा (ह्रीं), सकला (सकल)
मायया (ह्रीं) । यह प्रकाशवती विश्वमाता स्वरूपा आदि विद्या है ।
षष्ठं सप्तममथवह्निसारथिमस्या मूलत्रिकमादिशयन्तः ।
कथ्यं कविं कल्पकं काममीशं तुष्टुवांसो अमृतत्वं भजन्ते ॥९॥
अर्थ—ऊपर वाली विद्या के षष्ठं, सप्तम, और वह्निसारथि
अर्थात् मातरिश्वा का मूलत्रिकं (प्रथम तीन अक्षरों के स्थान पर
आदेश करने वाले साधक कथ्य (वाच्य पद) सर्वज्ञ कल्प के निर्माता
कामेश्वर को प्रसन्न करके मुक्त हो जाते हैं । (कल्पः शास्त्रे विधौ
न्याये संवर्ते ब्रह्मणो दिने) । यह लोपा मुद्रा मंत्र है ।
पुरं हन्त्रीमुखं विश्वमातूरवेरेखा स्वर-मध्यं तदेषा ।
वृहत्तिथि दर्शपंच च नित्या सषोडशीकं पुरमध्यंविभर्ति ॥१०॥
अर्थः—पुरं हन्त्रीमुखं (शिवाभिमुखं), विश्वमातुः (छंदे—
दीर्घ) विश्वमाता की, अवेः पुष्पवती की, एखा 'ए'नामाख्या, स्वर
मध्यं (स्वर हैं मध्य में) जिसके वह (विद्या), वृहत्तिथिदशपंच च
(शुक्ल पक्ष की १५ तिथियां) और षोडशीक बीज सहित नित्या