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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 392, कुल 415 में से

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पृष्ठ 392

६
सौन्दर्य लहरी के ११ वें श्लोकोक्त चार श्रीकंठ और
पांच शिव युवतियां ९ योनियां हैं। इनको वहां मूल प्रकृति
कहा गया है। ९ चक्र ९ आवरण हैं। प्रत्येक चक्र की
एक २ योगिनी है। उनके नाम प्रकट, गुप्त, गुप्ततर, संप्रदाय,
कुलोत्तीर्ण, निगर्भ, रहस्य, परा, और परपरातिरहस्य योगिनी हैं।
देखें श्लोक ११ सौंदर्य लहरी।
एका साऽसीत प्रथमा सा नवासीदासोनविंशदासोनत्रिंशत् ।
चत्वारिंशदथ तिस्रः समिधा उशतीरिव मातरो मा विशन्तु ॥३॥
अर्थ:—वह पहिले एक थी, फिर (अष्टार सहित) ९ हो
गई, (अन्तर्दशार सहित्) १९ हुई, (बहिर्दशार सहित) २९,
हुई, और (चतुर्दशार सहित ४३ हुई । ये सब प्रज्वलित
कान्ति युक्त समिधा सदृश तेजोमयी माताएं मेरे भीतर प्रवेश
करें । अर्थात मेरे शरीर में निवास करें ।
ऊर्ध्वज्वलज्ज्वलनं ज्योतिरग्रे तमो वै तिरश्चीनमजरं तद्रजोऽभूत् ।
आनन्दनं मोदनं ज्योतिरिन्दोरेता उ वै मण्डला मण्डयन्ति ॥४॥
अर्थ:—पहिले ऊर्ध्व ज्वाला युक्त प्रज्वलित ज्योति तमोगुण
हुई, बिना जीर्ण हुए अर्थात अनन्त वह जब तिरछी फैलीं, वह
रजोगुण हुआ, और आनन्द एवं मोद के देने वाली चन्द्रमा की