सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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और शक्तिकूट कहते हैं। पूरे मंत्र को मूल पंचदशाक्षरी विद्या कहते
हैं। यह भगवती का सूक्ष्म शरीर है। जिसका स्वरूप श्लोक ३२,
३३ में दिया गया है और सूक्ष्मतर रूप कामकला का रूप श्लोक
१९ में देखें (आनंद लहरी), कुण्डलिनी का वर्णन देखें श्लोक(९,१०) ।
श्रीभास्करराय ने अपने वरिवस्या रहस्य में तीनों त्रिकूटायुक्त
पंचदशी मंत्र के गायत्र्यार्थ, भावार्थ, संप्रदायार्थ, निगर्भार्थ, कौलिकार्थ,
रहस्यार्थ, महातत्वार्थ, नामार्थ, शब्दरूपार्थ, नामैकदेशार्थ, शाक्तार्थ,
सामरस्यार्थ, समस्तार्थ, सगुणार्थ और महावाक्यार्थ इन १५ प्रकार से
अर्थ समझाकर भावनाकरने का उपदेश किया है। कहा भी है
‘यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी’।
पुरुषार्थानिच्छद्भिः पुरुषैरर्थाः परिज्ञेयाः ।
अर्थानादरभाजां नैवार्थः प्रत्युतानर्थः ॥
(वरिवस्यारहस्य ५६)
अर्थः—पुरुषार्थों की इच्छा रखने वाले पुरुषों को अर्थ
जानने चाहिये, अर्थ का आदर न करने वालों को अर्थसिद्धि भी
नहीं होती, प्रत्युत अनर्थ होता है
मंत्र की वर्ण संख्या, उनका उद्धार, उच्चारण का काल
और मात्रा, उच्चारण, उत्पत्ति स्थान, आकार स्वरूप और
अर्थयुक्तभावना ये विद्या के अंतरंग अवयव कहलाते हैं, और
ऋषि, छंद, देवता, विनियोग, बीजशक्ति कीलक, न्यास, ध्यान
नियम और पूजा अर्चनादि बहिरंग अवयव कहलाते हैं। प्रायः