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सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 373, कुल 415 में से

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पृष्ठ 373

सौंदर्य लहरी ३२३
चिदात्मा, चिन्मय अन्तःपुरुष, चिन्मयी या चितिशक्ति कह कर
ध्यान और निदिध्यासन करता है । जैसा कि श्रुति कहती है
एकोवशी सर्वभूतान्तरात्मा, एकं रूपं बहुधा यः करोति ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यंति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतंनेतरेषाम् ॥
उसी परम तत्व को श्रीविद्या के उपासक ललिता महात्रिपुर
सुन्दरी कहते हैं ।
श्रीचक्रराजनिलया, श्रीमत्त्रिपुर सुंदरी ।
श्रीशिवा शिवशक्त्यैक्यरूपिणी ललिताम्बिका ॥
( ललिता सहस्रनाम )
अर्थात् श्रीचक्रराज में निवास करने वाली श्रीमत्त्रिपुर सुंदरी
श्रीशिवा ललिता अंबिका शिवशक्ति के भेदरहित ऐक्यरूपा है
त्रिपुर सुंदरी का अर्थ भास्करराय इस प्रकार करते हैं:--अत्र
त्रीणि पुराणि ब्रह्मविष्णुशिवशरीराणि यस्मिन् सः त्रिपुरः परशिवः,
तस्य सुंदरी शक्तिः । वायुसंहिता में भी कहा है कि:—
शिवेच्छया पराशक्तिः शिवतत्वैकतां गता ।
ततः परिस्फुरत्यादौ सर्गे तैलंतिलादिव ॥
अर्थ:—वह पराशक्ति सृष्टि के आदि में शिव की इच्छा
(संकल्प) से, शिवतत्व की एकता रखने वाली उस ही (शिव से)
परिस्फुरित होती है, जैसे तिलों से तेल । इसलिये यह ही भाव
सौंदर्य लहरी के प्रथम श्लोक में व्यक्त किया गया है ।