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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 370, कुल 415 में से

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पृष्ठ 370

३२० सौन्दर्य लहरी
होने तक सारी साधन यात्रा को बाह्य, अभ्यन्तर और मिश्रित्
उपासना भेद से तीन स्तरों पर बांटा जाता है । उनको बहिर्याग
और अन्तर्याग अथवा अपरा और परा पूजा भी कहते हैं । शुद्ध
सत्त्विक चेतन सत्ता एक परमात्मा की ही है और देहादि की
उपाधियों के योग से प्रतिभासित होने वाली चेतना जीव कहलाती
है । इसलिये चित्त की वृत्तियों को सब उपाधियों से हटाकर शुद्ध
चेतन सत्ता पर लगाना ही सब साधनों का सार है, जिसका
उपसंहार जिवाभिमान के सर्वथा नष्ट होने पर सब वृत्तियों का
परमतत्त्व में विलीनीकरण द्वारा होता है । कर्मयोगी उसे स्थित
प्रज्ञता कहता है, भक्त उसे जीव ब्रह्म का सायुज्य योग मानता है
और ज्ञानी उसे ब्राह्मी स्थिति जानता है ।
इसलिये उपासना सदा चेतनसत्ता की की जाती है, जड पदार्थों
की नहीं । व्यवहार में भी सब मनुष्य पुत्र कलत्र मित्र बंधु राजा
और राज्य कर्मचारियों के देह की सेवा द्वारा देही आत्मा की ही
प्रसन्नता प्राप्त किया करते हैं । परन्तु परम चेतन तत्त्व जिसकी
व्यापकता सर्वत्र है सामान्यतया मनबुद्धि और इन्द्रियों के द्वारा
ग्रहणगम्य नहीं, उसकी सेवा उपासना ‘ईशावास्यमिदँ सर्वं’ इस
श्रुति के अनुसार यत्र तत्र सर्वत्र भावना द्वारा ही प्रतिमादि जड
प्रतीकों के सहारे आवाहन पूजन के उपचारों सहित की जानी संभव
है । सर्वव्यापी परमेश्वर का आवाहन अर्चन करने का विनियोग यंत्र
प्रतिमा अथवा प्रतीक विशेष में उसके अस्तित्व की धारणा को दृढ
कराना मात्र है । इस प्रकार दृढ संकल्प और दृढ धारणा से सर्वव्यापी
की चेतन सत्ता उन जड प्रतीकों में इस प्रकार प्रकट हो जाती है