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सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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पृष्ठ 352

३०२ सौन्दर्य लहरी
पलंग का ध्यानः—
( ९२ )
गतास्ते मञ्चत्वं द्रुहिणहरिरुद्रेश्वरभृतः
शिवः स्वच्छच्छायाघटितकपटप्रच्छदपटः ।
त्वदीयानां भासां प्रतिफलनरागारुणतया
शरीरी शृङ्गारो रसइव दृशांदोग्धि कुतुकम् ॥
कठिन शब्दः—प्रच्छदपट=चादर, दृशां=दृष्टि को, दोग्धि=दुहता
है, कुतुकं=कौतुहल
अर्थः—ब्रह्मा हरि रुद्र और ईश्वर द्वारा रक्षा किये जाने
वाले (क्रमशः मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर और अनाहत् चक्र )
तेरे मंच के चार पाये हैं, अर्थात् चारों तेरा मंच बनाते हैं
उसपर बिछी हुई स्वच्छ छाया की बनी हुई कपट रुपी माया की
चादर शिव है, जो तेरी प्रभा के झलकने के कारण अरुण
दिख पडने से एसी प्रतीत होती हैं कि मानो शृङ्गार रस शरीरी
बनकर दृष्टि में कुतूहल उत्पन्न कर रहा है ।
शिव शक्त्यात्मक प्रथम स्पन्द आज्ञा चक्र में, सदाख्य अर्थात्
अर्धनारीश्वर शिव विशुद्ध में, ईश्वर, रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा क्रमशः
नीचे के चारों चक्रों के आधिदेव हैं। रुद्र विष्णु और ब्रह्मा
शुद्ध विद्या के अन्तर्गत है और जीव (पुरुष) माया के अन्तर्गत है
और अन्य २४ तत्त्वों का संघात् रूपी देह अशुद्धविद्या के अन्तर्गत है।