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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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पृष्ठ 334

२८४ सौंदर्य लहरी
दूसरे की रगड़ से पिस २ कर पतला होने पर आकाश तेरी
नाभि के बिल में अथवा नाभि में सर्पिणी की तरह प्रवेश
कर रहा है ।
यमुना नदी और आकाश दोनों का रंग श्याम है, इसलिये
आकाश को यमुना की पतली तरंग से उपमा दी गई है ।
आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से
पृथ्वी की उत्पत्ति मानी जाती है । प्रत्येक तत्व का अर्ध भाग
और दूसरे आधे भाग में शेष चारों तत्वों का सम भाग मिलने से
पंचीकरण द्वारा पांचों महाभूतों की रचना होती है । इसलिये
मूलाधार में पृथिवी तत्व के साथ १/८ अंश जल, १/८ अंश अग्नि, १/८
अंश वायु और १/८ अश आकाश रहता है, इसी प्रकार स्वाधिष्ठान
में जल के साथ १/८ अश प्रत्येक पृथ्वी, अग्नि, वायु और आकाश
का होता है, मणिपूर में अग्नि के साथ दूसर चार तत्वों का प्रतितत्व
१/८ अंश रहता है, हृदय में वायु के साथ चारों अन्य तत्व १/८ अंश में
रहते हैं और विशुद्ध चक्र में आकाश का आधा भाग और अन्य तत्वों
का अष्टांश रहता है। इसलिये विशुद्ध चक्रस्थ आकाश तत्व का संबंध
नीचे के सब चक्रों से बना हुआ है, और विशुद्ध चक्र में आकाश
का वेध होने के साथ ही नीचे के चक्रों के आकाश का भी वेध होना
संभव है, उससे पूर्व नहीं । मानो भगवती के भारी कुचों के
परस्पर रगड़ने से, चक्की के गले से उतरने वाले धान्य के सदृश,