सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 332, कुल 415 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 332

२८२ सौन्दर्य लहरी
कमनीय कविता करने लगा, कोई विशेष आत्मश्लाघा की बात नहीं
दिखती । यदि उसे आत्मश्लाघा कहा भी जाय, तो वह वास्तव में
भगवती के स्तन पान के फल की महिमा का गान मात्र है ।
एक ऐसी भी किंवदन्ती है कि द्रविड शिशु एक सिद्ध
महात्मा थे, उन्होंने एक स्तोत्र कैलाश के पत्थरों पर लिखा था,
जब शंकर भगवत्पाद कैलाश यात्रा को गये, तब उन्होंने उसे पढा ।
परन्तु भगवती के इशारे से इनको स्तोत्र पढते देखकर सिद्ध ने
उसे मिटाना आरंभ कर दिया । इतने अवसर में भगवत्पाद ने पूर्व के
४१ श्लोक कंठाग्र कर लिये थे, वे ही इस स्तोत्र के प्रथम ४१ श्लोक
हैं। उस द्रविड शिशु का संकेत इस श्लोक में किया गया है ।
परन्तु हमारे मत की पुष्टि, कि द्रविड शिशु से भगवत्पाद ने अपना
ही संकेत किया है, श्लोक १०० से होती है, जिससे सौन्दर्य
लहरी का लेखन समय उनका विद्यार्थी वय सिद्ध होता है ।
नाभि का ध्यानः -
( ७६ )
हरक्रोधज्वालाऽवलिभिरवलीढेन वपुषा
गभीरे ते नाभीसरसि कृतसंगो मनसिजः ।
समुत्तस्थौ तस्मादचलतनये धूमलतिका
जनस्तां जानीते तव जननि रोमावलिरिति ॥
अर्थः- हे अचल तनये ! हर के क्रोध की ज्वालाओं
से लिपटे हुए शरीर से कामदेव ने गहरे सरोवर सदृश तेरी