सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 415 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 322

२७२ सौंदर्य लहरी
चिबुक का ध्यान:—
(६७)
कराग्रेण स्पृष्टं तुहिनगिरिणा वत्सलतया
गिरीशेनोदस्तं मुहुरधरपानाकुलतया ।
करग्राह्यं शंभोर्मुखमुकुरवृन्तं गिरिसुते
कथंकारं ब्रूमस्तव चिबुकमौपम्यरहितम् ॥
अर्थ:-- हे गिरीसुते ! उपमारहित तेरी चिबुक ( ठोडी )
का वर्णन हम कैसे करें ? जिसे हिमाचल ने अर्थात तेरे पिता
ने वात्सल्य प्रेम से अपनी अंगुलियों से स्पर्श किया है, और
गिरीश ने अधरपान करने की आकुलता से बार २ उठाया है,
और जो उस समय ऐसी प्रतीत होती हैं मानों वह शंभु के
हाथ में मुख देखने के लिये उठाए हुए दर्पण का दस्ता हो ।
प्रकृति का मुख दर्पण सदृश है, जिसमें शंकर का मुख प्रति-
भासित हो रहा है । यह भाव बिहारी सतसई में इस प्रकार
दिखाया गया है ।
मैं समझो निर्धार यह जग कांचों कांचसो ।
एक ही रूप अपार प्रतिबिंबित लखियत जगत ॥