सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
पृष्ठ 303, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी २५३
अर्थः—कवियों की कविता रूपी स्तवक से उठने वाली
सुगंध के रसिक कानों का साथ न छोड़ने वाले तेरे कटाक्ष
विक्षेप युक्त, तिरछी निगाह से देखने वाले, भ्रमरों के सदृश,
और कविताओं के ९ रसों का आस्वाद लेने को बेचैन, चंचल
दोनों नेत्रों को देख कर ईर्ष्या के संसर्ग से तेरा (तीसरा) मस्तक
वाला नेत्र कुछ लाल रंग युक्त है ।
भाव यह है कि दोनों कान कवियों की कविताओं के रसिक हैं,
और दोनों नेत्र भी उसके ९ रसों का स्वाद लेने को बेचैन हैं,
इसलिये कानों का स्पर्श करने के लिये वहां तक फैले हुए हैं। और
उनसे तीसरा नेत्र ईर्ष्या करता है, क्योंकि उसकी पहुंच कानों तक
नहीं होती, इसीलिये वह असूया से लाल हो गया है। नेत्रों का
बडा होना सौंदर्य का लक्षण है। कवि उनको कान तक फैला हुआ
कहा करते हैं, और साथ ही इस मिस से तीसरे नेत्र के रक्तवर्ण
होने का कारण भी बताया गया है।
[ ५१ ]
शिवे शृङ्गारार्द्रा तदितरजने कुत्सनपरा
सरोषा गङ्गायां गिरिशचरिते विस्मयवती ।
हराहिभ्यो भीता सरसिरुह सौभाग्यजयिनी
सखीषु स्मेरा ते मयि जननि दृष्टिः सकरुणा ॥
अर्थः— शिव के प्रति तेरी दृष्टि शृंगारार्द्र है, इतर जनों
के प्रति कुत्सित उपेक्षा युक्त, गंगा पर सरोष, शिवजी के