सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४८ सौंदर्य लहरी
तीन नेत्रों का ध्यान:—
(४८)
अहः सूते सव्यं तव नयनमर्कात्मकतया
त्रियामां वामं ते सृजति रजनीनायकतया ।
तृतीया ते दृष्टिर्दरदलित हेमाम्बुजरुचिः
समाधत्ते संध्यां दिवस निशयोरन्तरचरीम् ॥
कठिन शब्दों का अर्थ: — त्रियामा=रात्रि; रजनी नायक=चन्द्रमा
अर्थ:— तेरा दक्षिण नेत्र सूर्यात्मक होने से दिन बनाता
है, और बायां चन्द्रात्मक होने से रात्रि की सृष्टि करता है,
और किंचित् विकसित सुवर्ण के बने हुए कमल की शोभा से
युक्त तेरी तीसरी दृष्टि दिन और रात दोनों के बीच में रहने
वाली संध्या है ।
दिन रात्रि की संधि प्रातः और सायंकाल दोनों समय होती है,
इसलिये तीसरी दृष्टि दोनों के सदृश हो सकती है, परन्तु दिवस
शब्द का प्रयोग प्रथम, और तत्पश्चात् निशि का प्रयोग होने से, सायं
संध्या से ही यहां अभिप्राय है । संध्या शब्द जो सायं संधि के लिये
ही प्रयुक्त होता है, इस आशय की पुष्टि करता है ।
सामने से देखने वाले को भगवती का दक्षिण नेत्र प्रथम
और वाम नेत्र पश्चात् दिख पड़ेगा जैसा कि पढते समय