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सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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२४२ सौंदर्य लहरी
रूप है और विशेषतया कार्तिक की कृष्णा चतुर्दशी ली जाय तो
और भी अच्छा है, जिसको रूप चतुर्दशी भी कहते हैं, और उसके
तुरन्त पश्चात् महालक्ष्मी पूजन का दीपावली पर्व होता है ।
केशों का ध्यानः
[ ४३ ]
धुनोतुध्वान्तं नस्तुलित दलितेन्दीवर वनं
घनस्निग्धंश्लक्ष्णं चिकुरनिकुरुम्बं तवशिवे ।
यदीयं सौरभ्यं सहजमुपलब्धुं सुमनसो
वसन्त्यस्मिन्मन्ये बलमथनवाटीविटपिनाम् ॥
ध्वान्त=अंधकार. इन्दीवर=नीलकमल. श्लक्षण=मुलायम. निकु-
रुम्ब=समूह. चिकुर=केश. सौरभ्यं=सुगंध. बलमथन=बलासुर का
मारने वाला इन्द्र.
अर्थः— हे शिवे ! तेरे गहरे चिकने मुलायम केशों का
समूह जो खिले हुए इन्दीवर के बन की तुलना करता है हमारे
अज्ञानान्धकार को हटावे, जिसमें गुंथे हुए इन्द्र की वाटिका
के वृक्षों के पुष्प. मेरी समझ में, उसकी सुगंधि से स्वयं सहज ही
सुगंधित होने के लिये वहां आबसे हैं ।
प्रातःकालीन विकसित इन्दीवर वनों की शोभा और उषःकाल
का प्रकाश दोनों मिलकर जैसे रात्रि के अन्धकार को भगाते हुए