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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 415 में से

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पृष्ठ 28

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'त्र्यंबकंयजामहे' इत्यादि वेदमंत्रों के आधार पर किया गया हैं,
अपिच त्रिपुरोपनिषद् में दोनों कादि हादि विद्याओं का स्पष्ट उल्लेख
है। श्रीमच्छंकराचार्य को श्रीविद्या की दीक्षा योगीन्द्र श्रीमद्गोविंद
पादाचार्य से मिली थी, श्री श्री गोविंदपादाचार्य को इस विद्या की
दीक्षा श्री श्री गौडपादाचार्य से मिली थी। श्री श्री गोडपादाचार्य का
लिखित सुभगोदय नामक ग्रंथ जो श्रीविद्या का ग्रंथ है, इस बात
की पुष्टि करता है। श्रीमच्छंकर भगवत्पाद ने सुभगोदय की छाया पर
ही सौंदर्य लहरी के प्रथम ४१ श्लोकों की रचना की है।
पूत्येक उपासना के बहिर और अन्तरंग दो भेद होते हैं।
बहिर्पूजा की उपयोगिता उस समय तक ही रहती है जब तक
कुण्डलिनी शक्ति का जागरण नहीं होता, तत्पश्चात् अन्तःसाधना का
आरंभ होता है। इस ही नियम के अनुसार श्रीविद्या की बहिरुपासना
श्रीचक्र पर की जाती है और अन्तरुपासना के लिये देह में ही श्रीचक्र
की भावना करने का विधान है। देखें भावनोपनिषद् परिशिष्ट नं.
(३)। देह में सुषुम्ना पथ द्वारा कुण्डलिनी का उसके जागरणोपरान्त
आरोह अवरोह होने लगता है। श्री चक्र पर अन्तर्भावना युक्त
बहिरुपासना करने से शक्ति के जागरण में सहायता मिलती है।
श्रीचक्र का अर्चन पूजन सब उपासना का कर्मकाण्ड रुपी स्थूल अंग
है और शक्ति जागरण के पश्चात षट् चक्र वेध की क्रियाओं का योग
परक साधन धारणा ध्यान समाधि के अंतरंग साधनों युक्त उसका
सूक्ष्म अंग है। स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से कारण तक पहुंचा जाता है।
यद्यपि सौन्दर्य लहरी एक तांत्रिक ग्रंथ है, तो भी वह श्रीमद्-
भगवत्पाद शंकराचार्य का विरचित है इस बात पर पराचीन और