सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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चक्र के ऊपर है, और सोम ही उसका शुद्ध स्वरूप है, इसलिये
उसे पर बिन्दु अथवा ब्रह्म का पर रूप कहते हैं ।
जिन साधकों की कुण्डलिनी शक्ति का जागरण नहीं हुआ है,
परन्तु ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हैं, उनको
श्रद्धा का अपनी श्रद्धा पर संयम करना अत्यावश्यक है ।
ब्रह्मचर्य से क्योंकि जब तक काम वासना का वेग कार्य
सम्बन्ध करता रहता है, शुक्र अन्तर्मुखी नहीं हो सकता ।
काम वासना भी स्त्रीसंग की ओर प्रेरणा करने वाली एक प्रकार की
राजसी श्रद्धा का ही रूप है । जब सात्विक श्रद्धा का उदय होता
है और देव बुद्धि अथवा पूज्य बुद्धि उत्पन्न होती है, तब तुरन्त
काम वासना शान्त हो जाया करती है । श्रद्धा ही बहिर्मुखी होकर
सृष्टि का कारण बन जाती है जैसा ऊपर पंचाग्नि विद्या में कहा गया
है और अन्तर्मुखी रहने पर श्रद्धा ही मोक्ष का साधन होती है ।
इसलिये श्रद्धा को सात्विक रखने पर स्थूल बिन्दु की ऊर्ध्व गति
संभव है, अन्यथा नहीं । देवता उसकी आहुति सृष्टि के हेतु
बहिर्यागार्थ निम्न स्तरों पर देते हैं और मुमुक्षु आत्मचिन्तन रूपी
अन्तर्याग द्वारा उसको उलट क्रम का अनुष्ठान करता है ।
गुरु शिष्य का संबंध भी श्रद्धा के सूत्र से बंधा होता है । इसलिये
गुरु शिष्य के संबंध पर भी कुछ विचार प्रकट कर के हम यहां
विषयान्तर के दोष को पाठकों के लाभार्थ ग्रहण करते हैं ।
गुरु और शिष्य का सम्बन्ध और श्रद्धा ।
गुरु और शिष्य में जो संबंध होता है, उसका सूत्र एक मात्र
शिष्य की गुरु के प्रति श्रद्धा ही है । यदि शिष्य की श्रद्धा शिथिल