सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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(५) स्त्री का गर्भ पांचवीं अग्नि है, उसमें शुक्र की आहुति दी
जाती है और बालक का देह उत्पन्न होता है।
जो मनुष्य इस क्रम को उलटना चाहते हैं, उनको ब्रह्मचर्यव्रत
अर्थात् ऊर्ध्व रेता रहने का व्रत धारण करके तप करना चाहिये ।
तब देवयान का मार्ग खुलता है ।
बहिर्मुख शुक्र संतानोत्पादक होने से सृष्टिकर्माभिमुख रहता
है, परन्तु ऊर्ध्व होकर अभ्यन्तर पंचाग्नियों द्वारा उत्तरोत्तर सूक्ष्म
होकर भ्रूमध्य में सोमात्मक परविन्दु के रूप में लौट जाता है ।
मूलाधार से शक्ति का उत्थान होना प्रथम अभ्यन्तर अग्नि है, जिसके
योग से शुक्र की ऊर्ध्वगति होती है, फिर वह स्वाधिष्ठान की अग्नि
से सूक्ष्म होकर सब अस्थियों में पृथिवीतत्व का वेध करता है और
मांस एवं रुधिर में भी जल का वेध करके मणिपूर चक्र में विद्युत्-
रूप अधिक सूक्ष्म होकर सूर्य को उन्मुख करता हुआ चन्द्र मण्डल
में पहुंच कर सोम में परिणत हो जाता है। प्रसव क्रम में सोम ही
शुक्र के रूप में परिणत हुआ था, प्रतिप्रसव क्रम में वह फिर अपने
पूर्व रूप में आ जाता है। श्रद्धा के सकाम होने से सोम प्रसवा-
भिमुख होता है और उस ही श्रद्धा के निष्काम होने पर वह अपने
कारण हैरण्यगर्भ रूपी समष्टि प्राण में लीन हो जाता है । समष्टि
प्राण स्वयं ब्रह्म की किरण ही हैं। कहा है
स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खंवायुर्ज्योतिरापः पृथिवी
इत्यादि ! (प्र० ६, ४)