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सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

सौंदर्य लहरी १५९
इनकी पृथक पूजा करने की आवश्यकता नहीं है, भगवती के पूजन
से सबकी पूजा हो जाती है। ब्रह्मा रजोगुण, विष्णु सत्वगुण और
रुद्र तमोगुण के अधिदेव हैं और तीनों गुण प्रकृति के अंग
हैं, अर्थात् माया की अपेक्षा से तीनों देवताओं का अस्तित्व है,
निर्गुण ब्रह्म मायातीत है। ईश्वर तत्व भी माया शक्ति के अधीन है।
परन्तु सदाशिव, जो यद्यपि माया का स्वामी है, परन्तु शक्ति का
प्रभुत्व इतना है कि विवश होकर सृष्टि करने को बाध्य होता है।
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥
(गीता० ९-८)
उसलिये
[ २५ ]
त्रयाणां देवानां त्रिगुण जनितानां तव शिवे
भवेत्पूजा पूजा तव चरणयोर्या विरचिता, ।
तथा हि त्वत्पादोद्वहनमणिपीठस्य निकटे
स्थिताह्येते शश्वन्मुकुलित करोत्तंस मकुटाः ॥
अर्थ:— हे शिवे ! तेरे चरणों की जो पूजा की जाती
है, उससे तेरे तीनों गुणों से उत्पन्न इन तीनों देवों का भी
पूजन हो जाता है। इसलिये यह उचित ही है कि ये तीनों
देव तेरे चरणों को धारण करने वाले मणियों के बने आसन