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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

सौंदर्य लहरी १५७
अर्धनारीश्वर रूपमें आधा शरीर शंकर का है और आधा
भगवती का, यह बात हम सदाख्यतत्व को समझाते समय बता आये
हैं। शंकर का शरीर स्फटिक सदृश स्वच्छ है, जो भगवती का
शरीर अरुण होने के कारण, उसकी अरुण आभा से अरुण दिखने
लगा है। और भगवती के स्तन के भार से वाम भाग के किंचित्
झुक जाने से शंकर का दक्षिण भाग भी झुक गया है; तीन नेत्र
और चन्द्र युक्त दोनों के रूप होने से यह पहचानना कठिन है,
कि दक्षिण भाग शंकर का है अथवा सारा शरीर भगवती का ही है।
सदाख्य तत्व प्रभवोन्मुख होने के कारण पूर्ण शक्ति युक्त होता है,
इसलिये अहम् विमर्ष के अध्यात्म भाव को शक्ति ने मानों
दबा रखा है।
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव ।
[ २४ ]
जगत्सूते धाता हरिरवति रुद्रःक्षपयते
तिरस्कुर्वन्नेतत्स्वमपि वपुरीशः(स्थगयति) (स्तिरयति)
सदा पूर्वः सर्वं तदिदमनुगृह्णाति च शिव-
स्तवाज्ञामालम्ब्य क्षणचलितयोर्भ्रूलतिकयोः ॥
अर्थः—ब्रम्हा जगत् की रचना करते हैं, हरि पालन और
रुद्र संहार करते हैं। ईश्वर सबका तिरस्कार करके अपने स्थिर
रखते हैं। और शिव जिसके नाम के पूर्व सदा लगा हुआ है