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सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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पृष्ठ 179

सौन्दर्य लहरी १३३
नीचे व्याख्या में क्लीं के स्थान पर ईं भी पढा जा सकता है । विन्दु
तीन हैं ब्रह्मा विष्णु और रुद्र । उनमें एक मुख है और दो स्तन ।
इस श्लोक में काम कला का ध्यान बताया गया है । जो क्लींमें
ककार के बिन्दु रूपी मुख के नीचे लकार के दो बिन्दुओं को दोनों
स्तनों से उपमित कर के ईकार रूपी हरार्धांगिनी के योग से बनती
है । इस मंत्र के प्रयोग का फल, इह लोक की स्त्रियों का वश करना
तो क्या तीनों लोक वश में किये जा सकते हैं । त्रिलोकी भी एक
विराट स्त्रीवत् ही है, जिसके सूर्य और चन्द्रमा दो स्तन सदृश हैं ।
परिशिष्ट नं. २ में त्रिपुरोपनिषद् की श्रुति ११ भी देखें । इस
उपमा से स्त्री मात्र में साधक का पूज्य मातृभाव जागृत किया
गया है । क्योंकि सूर्य प्राण रूपी और चन्द्रमा अमृत रूपी दुग्धपान
कराकर विश्व का पालन करते हैं । कहा भी है ।
विद्याः समस्तास्तवदेविभेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु ।
यद्यपि योगी के रूप लावण्य और तेजस्वी रूप को देखकर
कामिनियों के चित्त में क्षोभ उत्पन्न होना स्वाभाविक है, अपितु
योगी की इतनी महानता है कि त्रिलोकी भी उस पर अपना सर्वस्व
निछावर करने को तय्यार रहती है । क्या उसके हृदय में सामान्य
रमणियां काम का उद्वेग ला सकती हैं ? वह प्रकृति देवी के विराट
देह के सूर्य चन्द्ररूपी स्तनों के दूध को पीकर दोनों का योग करता
है । स्तन पान करने वाला शिशु कितना सुन्दर होता है, जिसके
रूप लावण्य पर सब ही मोहित होकर उसका कितने स्नेह से लालन-
पालन किया करते हैं, परन्तु क्या उस शिशु में भी कभी युवतियों