सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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मन की किरणें:— प्रथम ४ शुद्ध तत्व अर्थात् शिव, शक्ति,
सदाख्य और महेश्वर को छोडकर शेष ३२ । शिव शक्ति भेद से ६४ ।
विश्व के प्रस्तार में नाम और रूप अथवा वाचक और वाच्य
किरणों का वर्ण- अथवा शब्द और अर्थ भेद से, दो स्तर हैं। अर्थ
माला से सम्बन्ध भेद से ५ कलाएं, ३६ तत्व, और १४ भुवन हैं।
कलाओं और तत्वों के नाम ऊपर दिये जा चुके
हैं, १४ भुवन के उपभेद २२४ किये जाते हैं, इन २२४ भुवनों के
नाम स्थानाभाव से यहां नहीं दिये जाते ! शब्द भेद से ५१ वर्ण,
८१ पद और ११ मंत्र से सारे विश्व का प्रस्तार है । ३ लिंग
(पुं, स्त्री, नपुंसक,) ३ पुरुष (उत्तम, मध्यम और अन्य,) ३ वचन
(एक, द्वि और बहु) और ३ काल (भूत, वर्तमान, और भविष्य)
के परस्पर योग से ३×३×३×३=८१ प्रकार के पद होते हैं, और
५ कर्मेन्द्रियां, ५ ज्ञानेन्द्रियां और अन्तःकरण के एकादशविध
व्यापारों की सिद्धियों के लिये ११ प्रकार के मंत्र हैं, उनके ११
देवता ११ रुद्र हैं । इसलिये उक्त ३६० किरणों का मातृका
(वर्ण माला) से संबंध है और प्रत्येक किरण का पृथक पृथक देवता
है । उनका संबंध नीचे दिया जाता है ।
मातृकाओं का तत्वों से संबंध:—
पृथिवी की ५६ किरणें = ५० मातृका + ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः ।
जल की ५२ किरणें = ५० मातृका + सौं श्रीं ।
अग्नि की ६२ किरणें = ५० मातृका + औ औ औ औ, हं सः
हं सः हं सः हं सः ।