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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 415 में से

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पृष्ठ 142

१०० सौंदर्य लहरी
है। षट् चक्र वेध के पूर्व शक्ति का रूप जीवात्मिका और षट् चक्र
वेध के पश्चात् शिवात्मिका समझना चाहिये। जीवात्मिका का स्थान
स्वाधिष्ठान और शिवात्मिका का स्थान विशुद्ध चक्र हैं।
मूलाधार और स्वाधिष्ठान को अग्नि खंड, मणिपूर और अनाहत
को सूर्य खंड और विशुद्ध एवं आज्ञा चक्र को चन्द्र खंड कहते हैं।
योनिस्थान अग्नि की, अनाहत सूर्य की और आज्ञा चंद्र की पीठ
कहलाती हैं। अग्नि खंड में रुद्र ग्रंथि, सूर्य खंड में विष्णु ग्रंथि,
और सोम खंड में ब्रह्म ग्रंथि कहलाती हैं।
अन्तरिक्षगतो वह्निर्वैद्युतः स्वान्तरात्मकः ।
नभःस्थः सूर्यरूपोऽग्नि र्नाभिमंडलमाश्रिताः ॥
( यो शि ५, ३२ )
विषं वर्षति सूर्योऽसौ स्रवत्यमृतमुन्मुखः ।
तालु मूले स्थितश्चन्द्रः सुधां वर्षत्यधो मुखः ॥
( ५, ३३ )
अर्थः- अन्तरिक्ष में उठकर अग्नि विद्युत् रूप हो जाती
है, जो अपना अन्तरात्मा है। आकाश में स्थित अग्नि सूर्य रूप है,
यह नाभि मण्डल (मणिपूर और अनाहत् ) में आश्रित है, नीचे
की ओर मुख रहने पर वह विष की वर्षा करता है और ऊपर की
ओर मुख होने पर अमृत का स्रवण करने लगता है। तालू के मूल
स्थान ( आज्ञा ) पर चन्द्रमा का स्थान हैं, उसका मुख नीचे की
ओर है और वह अमृत की वर्षा किया करता है। अनाहत् चक्र
के १२ दल १२ आदित्य कहलाते हैं। उर्द्धमुख सूर्य और अधो-