सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी ६१
की प्रत्यंचा पर चढ़े हुए उपरोक्त पांच पुष्प बाण वाला इक्षु धनुष
कामदेव का भी अस्त्र है, और कामिनी स्त्री स्वयं शक्ति का ही
रूप है । इसलिये कामी मनुष्यों को भोगासक्ति में फंसाने के लिये
मानो महामाया ने अपना ही धनुष कामदेव को दे दिया है, क्योंकि
बिना ऐसे अस्त्र के भगवान् का सनातन अंश बंधन में नहीं
आ सकता था ।
भगवान् की लीला विचित्र है, अपनी ही शक्ति से वह स्वयं
ही बंध जाता है । पारमार्थिक दृष्टि से वह स्वयं स्त्री है और स्वयं
पुमान्, आत्म तत्त्व में लिंग भेद का भाव नहीं । वह स्वयं माया
है और स्वयं मायावी, स्वयं नट है और स्वयं दर्शक, स्वयं ईश्वर
है और स्वयं दास । कृष्ण राधा है और राधा कृष्ण, राम सीता है
और सीता राम, शिव शक्ति है और शक्ति स्वयं शिव । इसी
प्रकार आप ही रति है और आप ही काम ।
सब प्राणि मात्र का अन्तरात्मा एक ईश्वर स्वयं ही है, जो एक
रूप से अनेक हो रहा है, जैसा कि उसका आदि संकल्प था,
एकोऽहम् बहुस्यां प्रजायेयेति ।
इस लिये साधक जनों को महामाया के आखेट से बचने के
लिये कामिनी के काम बाणों से बचना चाहिये और भगवती के
चरणों का हृदय में ध्यान करना चाहिये । और
पर तिय ककार तजहु गुसाईं । ज्यों चौथ चन्दा की नाई ॥ तुलसीदास
क्योंकि, विद्या समस्तास्तव देवि भेदाः, स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु ।