सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
पृष्ठ 128, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ें६६ सौन्दर्य लहरी
अर्थः— कटि पर कण कण शब्द करने वाले घुंघुरुओं
युक्त मेखला बांधे हुए, हाथी के बच्चे के मस्तक पर निकले
हुए कुंभ सदृश स्तनों के भार से झुकी हुई, मध्य भाग में
पतली, शरद ऋतु की पूर्णिमा के चन्द्रमा जैसे मुख वाली, चारों हाथों
में धनुष, ५ बाण, पाश, और अंकुश धारण किये पुरारि की
आहो पुरुषिका हमारे सामने ( ध्यान में ) रहें ।
सं० टि० आहो पुरुषिका= पुरमथितुः शिवस्य अहंकार रूपा ।
त्रिपुरारि अर्थात् जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तीनों से अतीत ब्रह्म स्वरूप में
अहम् विमर्श का व्युत्थान होना यहां अभिप्रेत है । इस श्लोक से ब्लूँ
बीज ग्रहण किया जाता है, बाण से ब्, करतल से लू, मथितुः से उ
और आस्तां से अनुस्वार ।
देवताओं का ध्यान खड़ी हुई स्थिति में किया जाता है,
इसलिये सनातन धर्मावलंबियों के मंदिरों में खड़ी मूर्तियां प्रतिष्ठित
की जाती हैं। इसका अर्थ यह है कि खड़ी स्थिति में उपासक की
दृष्टि चरणों पर पडती है और बैठी हुई मूर्ति के मुख पर । ध्यान
चरणों का ही अभीष्ट है, पूजन भी चरणों का ही करना चाहिये ।
पुरारि या त्रिपुरारि शंकर को कहते हैं । जाग्रत, स्वप्न और
सुषुप्ति तीन पुर हैं, शंकर तीनों अवस्थाओं के बैरी है, क्योंकि वे
सदा समधिस्थ रहते हैं। मोक्ष ब्रह्म लीनता का नाम है, ब्राह्मी
अवस्था मे समस्त तीनों लोकों का एवं जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तीनों
अवस्थाओं का लय हो जाता है। कहा है:—