सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ सौन्दर्य लहरी
है। भगवती का तीसरा नेत्र जो भ्रुकुटि के ऊपर स्थित है, वह भी
अग्नेय है, जिसके एक कटाक्ष से संसार रूपी भवसागर के भय से
मुक्ति मिलती है। इसलिये ब्रम्हाजी ने मधु कैटभ से भयभीत होकर
इस ही बीज द्वारा भगवती की आराधना की थी। कामनाओं की
सिद्धि के लिए काम बीज का प्रयोग किया जाता है। जिसके गर्भ
में आद्योपान्त सारा विश्व है। (देखें श्लोक १९.)
भगवती के दोनों चरण सर्वशक्तिसामर्थ्य युक्त हैं, उनका
प्रतीक सौः बीज समझा जाना चाहिये। 'स' अक्षर शक्ति वाचक
माना जाता है, दो सकारों के लिये द्विवचनान्त 'सौ' पद दोनों
चरणों का संकेत करता है, विसर्ग भी शक्ति का ही द्योतक है।
इस प्रकार सौः बीज से भगवती के दोनों चरणों की सर्व शक्ति-
मत्ता प्रकट होती है। और तीनों बीजों से बाला का सब भयों
से मुक्ति और मन वांछित कामनाओं की सिद्धिदे ने वाला मंत्र सिद्ध
होता है। ऐसे ही नवार्ण मंत्र को भी जानना चाहिये।
काम देव सब प्रकार के मोहों का राजा है, जो तपस्वी ज्ञानियों
के चित्त पर भी प्रहार किये बिना नहीं रहता। मुमुक्षुओं को उससे
अपनी रक्षा करने के लिये, सब भयों से त्राण करने वाले भगवती
के चरणों की ही शरण में जाना चाहिये, दूसरा कोई मार्ग बचने
का नहीं है। यह बात आगे के तीन श्लोकों द्वारा कही गई है।
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हरिस्त्वामाराध्य प्रणतजनसौभाग्यजननीं
पुरा नारी भूत्वा पुररिपुमपि क्षोभमनयत् ।