सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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का प्रधान है और वह ही परिणत होकर अणुओं का रूप धारण कर
लेती है। आधुनिक विज्ञान वादियों के विद्युदाणुओं (Electrons)
को सृष्टि का कारण मानें तो उनके केन्द्रीय (Protons) अणुओं
को किसी जडशक्ति (Cosmic Energy) का अणुपरिणाम
(granulation) मानना पडेगा, और उस सृजनशक्ति (Cosmic
energy) को परमात्मा की आदि इच्छाशक्ति का परिणाम
समझना चाहिये ।
सर्व शक्तिमान की शक्ति का माप नहीं किया जा सकता, वह
अनन्त है, और उसकी रचना में अनेक ब्रह्माण्ड
शेष और हैं और प्रत्येक ब्रह्माण्ड के पृथकर हरि, हर और
कुण्डलिनी ब्रह्मा हैं। प्रत्येक ब्रह्मा जितनी शक्ति अपने
ब्रह्माण्ड को बनाने में खर्च करता है, वह सब अनन्तशक्ति का अति
स्वल्प भाग है, अर्थात दो एक कण के ही तुल्य है। क्योंकि
अनन्त वस्तु कभी सान्त (Limited) नही होती, यह बात प्रत्यक्ष
देखने में आती है। एक वट के बीज में कितना बडा वृक्ष निहित
है, इतना ही नहीं प्रत्येक बीज में अपने जैसे बीज असंख्यों की
गिनती में बनाने की शक्ति रहती है। अर्थात प्रत्येक बीज में
अनन्तशक्ति भरी हुई है। अणुबम का चमत्कारी प्रभाव अब सबको
विदित है। न जाने एक-एक अणु से क्या-क्या हो सकता है।
परमात्मा की अनन्त शक्ति, अणु-अणु में अनन्त ही परिपूर्ण है।
अनन्त भण्डार से प्रवाहित शक्ति सक्रिय (dynamic) होकर
अनन्त कार्य करके भी समाप्त नही होती, वरन अनन्त ही बच
रहती है। यदि सब समाप्त हो जाय, तो वह अनंत पद वाच्य