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सर्वकोश
सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished480 पृष्ठ

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पृष्ठ 358
३५८सत्यार्थप्रकाशः

सं०अर्थ–जो जिनवचन के अनुकूल चलते हैं वे पूजनीय और जो विरुद्ध चलते हैं वे अपूज्य हैं। जैन गुरुओं को मानना अर्थात् अन्यमार्गियों को न मानना ॥१०८॥

( समीक्षक ) भला जो जैन लोग अन्य अज्ञानियों को पशुवत् चेले करके न बांधते तो उन के जाल में से छूट कर अपनी मुक्ति के साधन कर जन्म सफल कर लेते। भला जो कोई तुम को कुमार्गी, कुगुरु, मिथ्यात्वी और कूपदेष्टा कहें तो तुम को कितना दुःख लगे? वैसे ही जो तुम दूसरे को दुःखदायक हो इसीलिये तुम्हारे मत में असार बातें बहुत सी भरी हैं।

मूल– तिहुअण जणं मरंतं, दट्टूण निअन्ति जे न अप्पाणं।
विरमंति न पावाउ, विद्धी धिट्ठत्तणं ताणं॥
—प्रक० भा० २। षष्टी० सू० १०९॥

सं०अर्थ–जो मृत्युपर्यन्त दुःख हो तो भी कृषि व्यापारादि कर्म जैनी लोग न करें क्योंकि ये कर्म नरक में ले जाने वाले हैं॥ १०९॥

( समीक्षक ) अब कोई जैनियों से पूछे कि तुम व्यापारादि कर्म क्यों करते हो? इन कर्मों को क्यों नहीं छोड़ देते? और जो छोड़ देओ तो तुम्हारे शरीर का पालन, पोषण भी न हो सके और जो तुम्हारे कहने से सब लोग छोड़ दें तो तुम क्या वस्तु खाके जीओगे? ऐसा अत्याचार का उपदेश करना सर्वथा व्यर्थ है। क्या करें विचारे। विद्या, सत्संग के विना जो मन में आया सो बक दिया।

मूल– तइया हमाण अहमा, कारणरहिया अनाणगव्वेण।
जे जंपन्ति उस्सुत्तं, तेसिं, दिद्विच्छ पंडिच्चं॥
—प्रक० भा० २। षष्टी० सू० १२१॥

सं०अर्थ०–जो जैनागम से विरुद्ध शास्त्रों को मानने वाले हैं वे अधमाधम हैं। चाहें कोई प्रयोजन भी सिद्ध होता हो तो भी जैन मत से विरुद्ध न बोले; न माने। चाहें कोई प्रयोजन सिद्ध होता है तो भी अन्य मत का त्याग कर दे॥१२१॥

( समीक्षक ) तुम्हारे मूलपुरुषों से ले के आज तक जितने हो गये और होंगे उन्होंने विना दूसरे मत को गालिप्रदान के अन्य कुछ भी दूसरी बात न की और न करेंगे। भला! जहां-जहां जैनी लोग अपना प्रयोजन सिद्ध होता देखते हैं वहां चेलों के भी चेले बन जाते हैं तो ऐसी मिथ्या लम्बी चौड़ी बातों के हांकने में तनिक भी लज्जा नहीं आती यह बड़े शोक की बात है।

मूल– जं वीरजिणस्स जिओ, मिरई उस्सुत्त लेस देसणओ।
सागर कोडाकोडिं हिंडइ अइभीमभवरणे॥
—प्रक०भा० २। षष्टी०सू० १२२॥

सं०अर्थ–जो कोई ऐसा कहे कि जैन साधुओं में धर्म है; हमारे और अन्य में भी धर्म है तो वह मनुष्य क्रोड़ान क्रोड़ वर्ष तक नरक में रह कर फिर भी नीच जन्म पाता है॥ १२२॥

( समीक्षक ) वाह रे! वाह!! विद्या के शत्रुओ! तुम ने यही विचारा होगा कि हमारे मिथ्या वचनों को कोई खण्डन न करे इसीलिये यह भयंकर वचन लिखा है सो असम्भव है। अब कहां तक तुम को समझावें। तुम ने तो झूठ निन्दा और अन्य मतों से वैर विरोध करने पर ही कटिबद्ध हो कर अपना प्रयोजन सिद्ध करना मोहनभोग के समान समझ लिया है।