सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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सवाहनाऽवाहना वा बहिर्वा स्वगृहान्तरे ॥ ३१३ ॥
नार्चनीया नृपाद्यैस्ता बिम्बे वे मण्डलादृते ।
क्षत्रियाद्यैस्तूभयत्रापि मण्डल एवार्चनं कार्यम्, न बिम्ब इत्याह—
सवाहनेति ॥ ३११-३१४ ॥
सुपर्णसंस्थिताः सर्वे बिम्बा वै ब्राह्मणैर्नृपैः ॥ ३१४ ॥
स्वगृहादौ च सर्वत्र पूजनीयाः सदैव हि ।
ब्राह्मणैः क्षत्रियैश्च सुपर्णारूढा मूर्तयः स्वगृहेऽन्यत्र वा बिम्बेष्वेवार्चनीया
इत्याह—सुपर्णेति ॥ ३१४-३१५ ॥
पूर्व में आदिदेव सम्बन्धिनी पर-वासुदेवादि की मूर्त्तियाँ यदि स्थूल न हों,
तब वे अर्चन के योग्य नहीं होती । किन्तु ब्राह्मण पूर्वोक्त वासुदेवादि मूर्त्तियों की
पूजा अपने घर पर मण्डल के बिना बिम्ब पर भी नित्य कर सकते हैं । घर के
बाहर पत्र (वाहन) पर स्थित का भी कर सकते है । इस प्रकार उन्हें भूति के
लिये अथवा मुक्ति के लिये सवाहना एवं अवाहना मूर्त्ति की बाहर और घर पर
सर्वत्र पूजा करनी चाहिये । क्षत्रियादि को बाहर या घर पर उभयत्र मण्डल में ही
अर्चना करनी चाहिये, बिम्ब पर नहीं । सुपर्ण पर स्थित बिम्बों की ब्राह्मण एवं
क्षत्रियों दोनों को अपने घर पर अथवा सर्वत्र पूजा करनी चाहिये । इसी प्रकार
वैश्यान्त सभी को सर्वत्र सभी की पूजा करनी चाहिये ॥ ३११-३१५ ॥
एवमन्यास्तु वैश्यान्तैः सत्तमैरखिलास्तु याः ॥ ३१५ ॥
सह शक्तीशभेदैस्तु न शक्तीशस्त्ववाहनः ।
बिम्बगो ब्राह्मणाद्यैश्च नित्यमर्च्यः पृथग्विना ॥ ३१६ ॥
एवं गरुडताक्ष्या॑रिरूढमूर्तयो विभवमूर्तिभेदैः सह ब्रह्मक्षत्रियवैश्यैर्बिम्बेष्वेव सर्व-
त्रार्चनीयाः । किन्तु वाहनारूढं विना केवलशक्तीशबिम्बं गृहे ब्राह्मणादिभिर्नार्च्यमिति
चाह—एवमिति सार्धेन ॥ ३१५-३१६ ॥
गरुड़ ताक्ष्यादि पर अधिरूढ़ मूर्त्तियाँ विभवादि मूर्त्ति भेद से बिम्ब में ही
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों को अर्चना करनी चाहिये । किन्तु वाहन पर आरूढ़ के
बिना केवल शक्तीश बिम्ब की गृह पर ब्राह्मणादि अर्चन न करे ॥ ३१६ ॥
स्वाश्रमे बन्धुवर्गस्य मध्यस्थो ह्यनिशं तु वै ।
अविनासौम्यरूपेण अव्युत्पन्नजनस्य च ॥ ३१७ ॥
दृग्गते भगवद्वक्त्रे कार्ये त्रैलोक्यभीतिदे ।
यच्छन्ति शुभमात्रार्थाश्चित्रस्थाश्चाशुभं गृहे ॥ ३१८ ॥
बहिष्कृता विशेषेण हर्म्यप्रासादभूमिषु ।