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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 615

५५६ सात्वतसंहिता
मान एवं उन्मान कहते हैं—इस प्रकार किसी एक वस्तु का भक्तिपूर्वक संग्रह कर
अपने अभीष्ट आकार का बिम्ब निर्माण करे । अब हे सङ्कर्षण ! बिम्ब के आकार
का मान सुनिये ॥ ९१ ॥
ऋज्वाख्यमविकारं च व्यापकं त्वेकमूर्तिमत् ।
भूभागे सुसमे श्लक्ष्णे मानमुत्कीर्य तेन वै ॥ ९२ ॥
निरूप्यावयवानां च लक्ष्म विस्तृतपूर्वकम् ।
जो ऋजु हो, व्यापक हो, एक मूर्त्ति में रहने वाला हो, ऐसे मान समतल
चिकने वाले भूभाग पर खोद कर लिख लेवे । फिर विस्तारपूर्वक तत्तद् अङ्गावयवों
के समस्त लक्षणों को अच्छी तरह देख कर बिम्ब निर्माण करे ॥ ९२-९३ ॥
मानपरिभाषाविधानम्
अष्टाधिकशतांशो यः स्वोन्नतेरङ्गुलं च तत् ॥ ९३ ॥
द्वे अङ्गुले कलानेत्रं गोलकं भाव एव च ।
अङ्गुलादष्टभागो यः स यवः परिकीर्तितः ॥ ९४ ॥
षट्कलं च परिज्ञेयं तालं बिम्बादिकर्मणि ।
मुखाङ्गनाभिमेढ्रक्ष्मास्तालमानास्त्वथोरुयुक् ॥ ९५ ॥
द्विकले च तथा जङ्घे गुल्फं जानुर्गलाञ्चकम् ।
त्र्यङ्गुलं त्र्यङ्गुलं ज्ञेयमित्युन्मानमुदाहृतम् ॥ ९६ ॥
अब मान कहते हैं—मनुष्य की अपनी-अपनी ऊँचाई का मान एक सौ
अङ्गुल कहा गया है । उसका १०८ वाँ भाग एक अङ्गुल होता है । दो अङ्गुल
कला, नेत्र गोलक अथवा भाव कहा जाता है । एक अङ्गुल का आठवाँ भाग
‘यव’ कहा जाता है । छः कला का एक ताल होता है, जिसका उपयोग
बिम्बादि कर्म में किया जाता है । मुखाङ्ग, नाभि, मेढ्र, क्ष्मा का मान एक ताल
होता है तथा दोनों ऊरु दो-दो कला के होते हैं । जङ्घा, गुल्फ, जानु और
गलाञ्चक तीन-तीन अङ्गुल के होने चाहिये । इस प्रकार उन्मान का निरूपण
किया गया ॥ ९३-९६ ॥
जटाधराणां बिम्बानां दीर्घह्रस्ववशेन तु ।
चतुष्कलं च त्रिकलं मानं मानाद् बहिः क्षिपेत् ॥ ९७ ॥
जटाधारी बिम्बों के बड़े और छोटे होने के कारण चार कला का और तीन
कला का मान कहा गया है । वह मान से बाहर भी हो सकता है ॥ ९७ ॥
त्रिपञ्चसप्तशिखरो मौलिरष्टकलोन्नतः ।