सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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ऐश्वर्य स्वातन्त्र्यपरिबृंहित जगत्कर्तृत्व ।
ज्ञान स्वप्रकाश और नित्य एवं सर्वावगाही गुण को ‘ज्ञान’ कहते हैं ।
द्रव्ययाग बहिर्याग । द्रव्यैरर्घ्यादिभिः क्रियमाणो यागः (६.१) ।
पञ्चतालकम् पाँच ताल (बित्ता) (२४.२३७) ।
पलम् पलप्रमाणं तु पारमेश्वरे (१८.१३१-१३२)—
चत्वारो व्रीहयः कुञ्जस्तेऽष्टौ माञ्जिष्ठमुच्यते ।
तच्छतं षष्टिरधिकं निष्कं निष्काष्टकं पलम् ॥
प्रणालभाग अभिषेक जल निकलने हेतु नलिका (६.४६) ।
प्राणायामम् नाभिदेशस्थितं प्रभुं स्मरन् उदरगं मलं निस्सृत्येत्यनेन प्राणायामः
सूच्यते (१७.१८-२०) ।
बल जगत् के निर्माण में श्रमाभाव नारायण का बल है ।
ब्रह्मबीज चतुष्टय श ष स ह (सात्वत सं० पृ० ५४) ।
ब्रह्मसूक्त ‘सहस्रशीर्षा’ से लेकर ‘दक्षिणे तु भुजे विप्र’ तक १६ मन्त्र
ब्रह्मसूक्त कहे जाते हैं । (द्र० अलशिङ्ग भाष्य पृ० ८४) ।
मन्त्रराट् क्षौं (नृसिंह मन्त्रबीज) ।
मात्रावित्तम् धनं मीयते परिच्छिद्यते पूर्यत इति मात्रा, मात्रार्थं वित्तं द्रविणम्
(६.६१) ।
यव एक अङ्गुल का आठवाँ भाग ‘यव’ कहलाता है ।
वीर्य विकारराहित्य, निर्विकार ब्रह्म में जगदुपादान कारण होने पर भी
किसी भी प्रकार के विकार का उदय न होना ।
व्यूह षाड्गुण्य में से दो-दो गुणों की प्रधानता होने पर तीन व्यूहों की
सृष्टि ।
शक्ति जगत् का उपादान कारण ।
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