सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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द्वादशान्त में, वृत्तमण्डल मध्य में ध्यान कर, पञ्चतन्मात्राओं से निर्मुक्त उसी में
अपने शरीर को जला देवे । फिर दाहिने पैर के अङ्गुष्ठ प्रान्त प्रदेश में युगान्त
अग्निस्वरूप ज्वाला-शत स्वरूप शिखाक्षर का ध्यान कर चारों ओर उसी में जलते
हुए अपने विग्रह का ध्यान करे ॥ २२-२५ ॥
फिर अपने देह की उस ज्वाला को मन्त्रनाथ में लीन होते हुए उसी का ध्यान
करे । दिव्य प्रशान्ताकार उन मन्त्रनाथ को चित्त पर स्थापित कर, अपने मन्त्र से
प्रतिपाद्य द्वादशान्त स्थित भगवान् से निकले हुए अमृत समूह रूप जल से अपने
विग्रह का आसिञ्चन करे । तदनन्तर मन्त्र सहित उस बिम्ब को द्वादशाङ्गुल के ऊपर
स्थित वृत्तमण्डल के मध्य में रहने वाले अपने हृदय में स्थापित करे ॥ २५-२६ ॥
करन्यासविधानम्
अथ हस्तद्वये न्यसेद् दीप्तिमद् द्वादशाक्षरम् ॥ २७ ॥
मणिबन्धान्नखाग्रं तु मूलमन्त्रपुरस्सरम् ।
हृदादयोऽस्त्रपर्यन्ता अङ्गुष्ठाद्यङ्गुलीषु च ॥ २८ ॥
सर्वासु युग्मयोगेन नेत्रं नखमुखाश्रितम् ।
करन्यासमाह—अथेति द्वाभ्याम् । द्वादशाक्षरं पूर्वोक्तनृसिंहद्वादशाक्षरमि-
त्यर्थः । मूलमन्त्रपुरस्सरं पूर्वोक्तनृसिंहबीजपुरस्सरमित्यर्थः । युग्मयोगेन हस्तद्वयेऽपि
युगपदित्यर्थः ॥ २७-२९ ॥
इसके बाद दीप्तिमद् द्वादशाक्षर मूल मन्त्र से दोनों हाथों के मणिबन्ध से
नखाग्र तक न्यास करे । इसी प्रकार हृदय से लेकर अस्त्र पर्यन्त तथा अङ्गुष्ठादि
अङ्गुलियों में भी हृदयन्यास और करन्यास करे ॥ २७-२८ ॥
इसी प्रकार दोनों हाथों को एक में मिलाकर नख, मुख तथा शिर से ले कर
चरण पर्यन्त सुधी साधक द्वादशाक्षर मन्त्र का देह में न्यास करे ॥ २९ ॥
अङ्गन्यासविधानम्
आमूर्ध्नश्चरणान्तं तु द्वादशार्णं न्यसेत् तनौ ॥ २९ ॥
जीवभूतं तदन्तःस्थं मूलमन्त्रं तथा न्यसेत् ।
हृदाद्यं नेत्रपर्यन्तमङ्गषट्कं स्वगोचरे ॥ ३० ॥
स्वस्वाङ्गुलियुगेनैव तेजोरूपं विनाऽऽकृतेः ।
श्रीवत्सं वक्षसो वामे पूर्णेन्दुसदृशद्युतिम् ॥ ३१ ॥
अङ्गन्यासमाह—आमूर्ध्न इति द्वाभ्याम् । स्वगोचरे = हृदयादिस्थानेष्वि-
त्यर्थः । स्वस्वाङ्गुलियुगेन = वक्ष्यमाणहृदादिमुद्रयेत्यर्थः । आकृतेर्विना = निराकार-
मित्यर्थः ॥ २९-३१ ॥