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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 401

३४२ सात्वतसंहिता
जपादि कार्यों से भले ही उसे अणिमादि की सिद्धि न हुई हो किन्तु उन सिद्धि के
लिङ्गों (=चिन्हों) के बिना यदि उसके चित्त के प्रसादादि लिङ्ग तथा शान्ति आदि
चिह्न प्रगट हो गये हों तब उसके पाप का क्षय हो गया ऐसा समझ ले । हे
पद्मदलेक्षण सङ्कर्षण ! शिष्य परीक्षित हो जाने पर गुरु से पर व्यूह एवं विभवादि
(षाड्गुण्य) तीनों दीक्षा के प्राप्त करने के लिये प्रार्थना करे ॥ ३६-३९ ॥
सिद्धीनां वैभवीयानां षाड्गुण्यमहिमाप्तये ॥ ३९ ॥
निःश्रेयसविभूत्यर्थं ग्राह्यं दीक्षात्रयं वरम् ।
अभ्यर्थितात् सुप्रसन्नात् प्रतिपन्नाच्च देशिकात् ॥ ४० ॥
तदनन्तरं गुरुं प्रार्थ्य तत्सकाशात् परव्यूहविभवदीक्षात्रयं ग्राह्यमित्याह—सिद्धी-
नामिति सार्धेन ॥ ३९-४० ॥
सानुकम्पेन वा तेन स्वयमप्रार्थितेन च ।
कार्यं संशुद्धपापानां भीतानां शरणैषिणाम् ।
संस्कृतानां हि युक्तानामघक्षालनकर्मणि ॥ ४१ ॥
॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायामघशान्तिकल्पो नाम
षोडशः परिच्छेदः ॥ १६ ॥
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अप्रार्थितोऽपि गुरुः स्वयमेव कृपया योग्यानां शिष्याणां दीक्षां कुर्यादित्याह—
सानुकम्पेनेति सार्धेन ॥ ४१ ॥
॥ इति श्रीमौज्यायनायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य
योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते
सात्वततन्त्रभाष्ये षोडशः परिच्छेदः ॥ १६ ॥
— ❦ —
इस प्रकार अपने निःश्रेयस प्राप्ति के लिये उक्त तीनों दीक्षा प्राप्त करे ।
अभ्यर्थना से, सुप्रसन्नता से, सेवा से, अनुग्रह से प्रसन्न हो कर बिना प्रार्थना के भी
गुरु शिष्य को दीक्षा देवे । इस प्रकार गुरु परीक्षा द्वारा भी शरणागत शिष्य को
पाप से विशुद्ध कर दीक्षा प्रदान करे ॥ ४०-४१ ॥
॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के अघशान्तिकल्प
नामक षोडश परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ १६ ॥
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