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सर्वकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 373

३१४ सात्वतसंहिता
देवीनां सर्वासामपि सामान्यं लक्षणमाह—दिव्यमाल्येति ॥ ४३-४४ ॥
सभी दिव्य माला धारण किये हुए अनेक अलङ्कारों से विभूषित हैं ये सभी
दिव्यमाला तथा दिव्यवस्त्र धारण किये हुए अपने-अपने पतियों की ओर देख
रही हैं ॥ ४३-४४ ॥
चतस्रः शक्तयो यास्तु विभोः शयनगस्य तु ॥ ४४ ॥
प्रागुक्तास्तत्र पूर्वाशावस्थिता वीजयन्त्यजम् ।
त्रयं यद् दिक्त्रयस्थं तु तत्संवाहनतत्परम् ॥ ४५ ॥
पातालशायिनः परितः स्थितस्य लक्ष्म्यादिशक्तिचतुष्टयस्य हस्तव्यापारानाह—
चतस्र इति सार्धेन ॥ ४४-४५ ॥
इसके अतिरिक्त भगवान् की चार शक्तियाँ और हैं जो उनके शयनागार में
निवास करती हैं। इन देवियों के विषय में पहले कह आये हैं (द्र. १२.१०७-
१०८) ये भगवान् का वीजन करती हैं। इसके अतिरिक्त तीन और शक्तियाँ हैं जो
तीनों दिशाओं में भगवान् का पदसंवाहन करती हैं ॥ ४५ ॥
यत्रैका श्रीर्विभोस्तत्र सन्निवेशः पुरोदितः ।
यत्रैका श्रीर्विभोस्तत्र वामे वा दक्षिणेऽपि वा ॥ ४६ ॥
लक्ष्मीमात्रविषयमाह—यत्रेति । पुरोदितः पूर्वम् “पद्मासनादिना चैव केवलं वा
श्रियान्वितः” (१२।१९२) इत्यत्र ।
षष्ठेनालिङ्गिता देवी सारविन्देन बाहुना ।
तदंसलग्नकरया देव्या तच्चित्तयाऽनिशम् ॥
संवीज्यमानं विनयाच्चामरेण सितेन तु।—(१२।१०७-१०८)
इत्यत्र वोक्त इत्यर्थः । तथा च लक्ष्मीतन्त्रे—“श्रीर्नाम द्विभुजस्याहमङ्कस्था
वरवर्णिनी” (८।१२) इति ॥ ४६ ॥
उसमें से एक, जिसका नाम श्री है उनका सन्निवेश पहले (१२.१९२) कह
आये हैं । एक ओर श्री हैं जो भगवान् के कदाचित् दायें और कदाचित् वाम भाग
में निवास करती हैं ॥ ४६ ॥
श्रीपुष्टिद्विकस्य लक्षणकथनम्
श्रीपुष्ट्याख्यद्वयं यत्र तत्र तद् दक्षिणोत्तरे ।
पद्मासनेनोपविष्टा पक्षिपक्षद्वये स्थिता ॥ ४७ ॥
नलिनीनालहस्ताढ्या मृदुकुम्भकराऽपरा ।
अग्नीषोममयो देह आद्यो यः सर्वगस्य च ॥ ४८ ॥
तस्य शक्तिद्वयं तादृगमिश्रं भिन्नलक्षणम् ।