सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थः परिच्छेदः ४७
वासुदेवादीनां लक्षणकथनम्
सौम्यमूर्तिचतुष्कं तु सूर्यदिक्प्रसृतं च यत् ॥ ७ ॥
प्राच्यां सितेन वपुषा सूर्यकान्त्यधिकेन तु ।
व्यक्तिमभ्येति भगवान् वासुदेवात्मना स्वयं ॥ ८ ॥
पद्मरागसमानेन तेजसा तदनन्तरम् ।
उदेति दक्षिणस्यां वै प्रभुः सङ्कर्षणात्मना ॥ ९ ॥
अथ वासुदेवादीनां लक्षणान्याह—सौम्येत्यारभ्य ज्वालामण्डलमध्यगा
इत्यन्तम् ॥ ७-१६ ॥
अब वासुदेवादि का लक्षण कहते हैं—वे भगवान् पूर्व से उत्तर दिशा तक
चार प्रकार की सौम्यादि मूर्तियों में प्रकट हैं । पूर्व में सूर्य कान्ति से भी अधिक
अपने तेज से वासुदेव के रूप में व्यक्त हो जाते हैं ॥ ८-९ ॥
घर्मांशुरश्मिसन्तप्तशतधामाधिकेन तु ।
रूपेण पश्चिमस्यां च व्यक्तं प्रद्युम्नसंज्ञया ॥ १० ॥
वही भगवान् सैकड़ों सूर्य से अधिक रश्मियों से भी अधिक तेज से युक्त
प्रद्युम्न रूप से पश्चिम दिशा में व्यक्त हो जाते हैं ॥ १० ॥
शरद्गगनसंकाशवर्णेन परमेश्वरः ।
समास्त उत्तरस्यां चाप्यनिरुद्धात्मना ततः ॥ ११ ॥
वही परमेश्वर शरत्कालीन आकाश के समान अपने स्वच्छ रूप से उत्तर
दिशा में अनिरुद्ध रूप से प्रगट हो जाते हैं ॥ ११ ॥
संस्थानमादिमूर्तेर्वे सर्वेषां तु समं स्मृतम् ।
सूर्यकोटिप्रभाः सर्वे तेजसा कमलेक्षणाः ॥ १२ ॥
आदि मूर्ति के सभी स्वरूपों का संस्थान समान ही कहा गया है । सभी के
नेत्र कमल के समान मनोहर हैं । तेज में वे सभी मूर्त्तियाँ करोड़ों सूर्य के समान
तेजस्विनी हैं ॥ १२ ॥
दन्तज्योत्स्नावितानैस्तु प्रकटीकृतदिङ्मुखाः ।
पूर्णचन्द्रायुताकारा मुक्ताहाराद्यलङ्कृताः ॥ १३ ॥
लसत्पीयूषसदृशैः स्वाम्बरैः स्रग्वरैर्युताः ।
वरायुधोद्यतकराः स्वकैश्चिह्नैरनुज्झिताः ॥ १४ ॥
सभी प्रभु की मूर्तियाँ अपने दाँतों की ज्योत्स्ना से समस्त दिशाओं को
देदीप्यमान करती हैं । अयुत संख्यक चन्द्रमा की कान्ति के समान सभी मोतियों