सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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( २९६ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पातञ्जल-
क्रियाका अर्थ व्यापार हे । तथा च अन्यार्थ जो बोधित होता हे वह लक्षणा
है अन्यार्थप्रतिपादनम मुख्यार्थका बाध शक्यार्थ सम्वन्ध ओर रूढि या प्रयोजन
यह तीनो हेतु हैं तयोर्ग ( मुख्यार्थसम्वन्धित्व ) लक्षणा में भी जोडना चाहिये नही
तो व्यञ्जना ओर शक्तिस्मृतिमे भी अतिव्याप्ति होगी मुख्यकाभी अभिधारूप मुख्यार्थ
सम्वन्धसे प्रतिपादन हो सक्ता हे इसलिये उसके वारणार्थ अन्यपद है अन्य अर्थात्
अमुख्य हे यल्लक्ष्यते यहापर तिङ्प्रत्ययक अर्थ आश्रयमें यद्यपि धात्वर्थ प्रतिपादन
विशेषणी भूत हे तथापि उसीको यत् शब्दसे परामर्श होता हे क्योकि यत् तत्
शब्दके नित्य सम्वन्ध होता हे तत् शब्दसे लक्षणा का बोध होता हे अत' यत् शब्दभी
धात्वर्थ मात्रका बोधक हे सा इति स्त्रीलिङ्गका निर्देश लक्षणा इति विधेय स्त्रीलिङ्ग
पदके अभिप्रायसे हे कैयटनेभी कहा है कि उद्देश्य ओर विधेयका अभेद प्रतिपादन
करनेवाले सर्वनामपद क्रमसे दोनोंके लिङ्गके बोधक होते हैं यथा “ शैत्य हि यत्सा
प्रकृतिर्जलस्य ” इति ॥ ७१ ॥
तत्र कर्मणि कुशल इत्यादिरूढिलक्षणाया उदाहरणं कुशान्
लातीति व्युत्पत्त्या दर्भादानकर्तरि यौगिक कुशलपदं विवेच-
कत्वसारूप्यात् प्रवीणे प्रवर्त्तमानम् अनादिवृद्धव्यवहारपरम्प-
राजुपातित्वेनाभिधानवत् प्रयोजनमनपेक्ष्य प्रवर्त्तते । तदाह,
'निरूढालक्षणा काश्चित् सामर्थ्यादभिधानवत्' इति ॥ तस्मात्
रूढिलक्षणाया प्रयोजनापेक्षा नास्ति । यद्यपि प्रयुक्त शब्द
प्रथमे मुख्यार्थं प्रतिपादयति तेनार्थेनार्थान्तर लक्ष्यत इति
अर्थधर्मोऽय लक्षणा तथापि तत्प्रतिपादके शब्दे समारोपित
सन् शब्दव्यापार इति व्यपदिश्यते । एतदेवाभिप्रेत्योक्त लक्ष-
णारोपिता क्रियेति ॥ ७२ ॥
कर्मणि कुशल यह रूढिलक्षणाका उदाहरण है कुशल पद कुशान् लाति इस
व्युत्पत्तिसे दर्भका आनयन कर्तामें यौगिक है एतादृश मुख्यार्थ कर्मम बाधित होनेसे
विवेचकत्वरूपसम्वन्धसे विचारशीलमें लाक्षणिक है यह अनादि वृद्ध व्यवहारमूलक
होनेसे शक्तिके समान है कहाभी है कि निरूढ लक्षणाशक्तिका समानही है अत'
रूढिलक्षणा मे प्रयोजनकी अपेक्षा नहीं है । यद्यपि शब्द प्रथम मुख्यार्थका बोधन
करता है परन्तु मुख्यार्थके बाध होनेसे अर्थान्तरलक्षित होता हे तथा लक्षणा
अर्थका धर्म हे तथापि अर्थ प्रतिपादक शब्दमें आरोपित है इस अभिप्रायसे कहते हैं