सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( २९३ )
प्रणवान्तरितान् कृत्वा मन्त्रवर्णान् जपेत् सुधी ॥ मन्त्रार्ण-
संख्यया तद्धि जीवनं संप्रचक्षते ॥ ५७ ॥
बुद्धिमान् लोग प्रणवको अन्तरित युक्त करके मन्त्रवर्णको मन्त्रके अक्षरोंकी
संख्यामें जप करनेका नाम जीवन है ॥ ५७ ॥
मन्त्रवर्णान् समालिख्य ताडयेच्चन्दनाम्भसा ॥ प्रत्येकं वायु-
बीजेन ताडनं तदुदाहृतम् ॥ ५८ ॥
मन्त्राक्षरोंको लिखकर प्रत्येक अक्षरोंको वायुबीजका उच्चारण करके चन्दनजलसे
ताडन ( प्रोक्षण ) करनेको ताडन कहते हैं ॥ ५८ ॥
विलिख्य मन्त्रवर्णांस्तु प्रसूनै करवीरजैः ॥ मन्त्राक्षरेण संख्या-
तैर्हन्यात्तद्बोधनं मतम् ॥ ५९ ॥
मन्त्राक्षरोंको लिखकर अक्षरसमसंख्यक कनेरके फूलोंसे हनन करनेको बोधन
कहते हैं ॥ ५९ ॥
स्वतन्त्रोक्तविधानेन मन्त्री मन्त्रार्णसंख्यया ॥ अश्वत्थपल्लवै-
र्मन्त्रमभिषिञ्चेद्विशुद्धये ॥ ६० ॥
जापक तत्तन्मन्त्रविधिसे मन्त्र शुद्धयर्थ पीपलके पत्तोंसे मन्त्राक्षरसंख्याकी बराबर
अभिषिक्त करनेको अभिषेक कहते हैं ॥ ६० ॥
सञ्चिन्त्य मनसा मन्त्रं ज्योतिर्मन्त्रेण निर्दहेत् । मन्त्रे मलत्रयं
मन्त्री विमलीकरणं हि तत् ॥ तारव्योमाग्निमनुयुक्तं ज्योति-
र्मन्त्र उदाहृत ॥ ६१ ॥
मनसे मन्त्रको चिन्तवन कर ज्योतिर्मन्त्रसे मलत्रयको निर्दहन करे इसीको विमली
करण कहते हैं । तार, व्योम, अग्नियुक्त मन्त्र ज्योतिर्मन्त्र है ॥ ६१ ॥
कुशोदकेन जप्तेन प्रत्यर्णं प्रोक्षणं मनो । वारिबीजेन विधिव-
देतदाप्यायनं मतम् ॥ ६२ ॥
अभिमन्त्रित कुशोदकसे मन्त्रके प्रत्येक अक्षरोंको वारि बीजोच्चारण कर विधिवत्
प्रोक्षण करनेको आप्यायन कहते हैं ॥ ६२ ॥
मन्त्रेण वारिणा मन्त्रे तर्पणं तर्पणं स्मृतम् ॥ ६३ ॥