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सर्वकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 316 में से

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पृष्ठ 201

( १९४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ औलूक्य-

और संस्कारमे विनाशमें प्रमाण यह है कि शब्दवत् व्यापकद्रव्यका क्षणिकविशेष
गुण होनेसे विवादग्रस्त ज्ञान स्वोत्तर उत्पद्यमान कार्य (गुण) से नष्ट होता है
इत्यादि अनुमान है द्रव्यके आरम्भक संयोगके विरोधी विभागोत्पादक कर्म्मके
समकालमें एकत्वज्ञानसे आश्रयकी निवृत्ति होती है कर्म समकालमें अपेक्षाबुद्धि-
संस्कारसे अपेक्षाबुद्धि और आश्रयबुद्धि दोनोंकी निवृत्ति होती है। विनाशककी विना
शक बुद्धि अपेक्षाबुद्धि है। मुक्तावलीमें अनेक एकत्व (अयमेक अयमेक इत्यादि)
बुद्धिको अपेक्षाबुद्धि मानी है ॥ १४ ॥
अथ द्व्यणुकनाशमारभ्य कतिभि क्षणै पुनरन्यद्द्व्यणुक-
मुत्पद्य रूपादिमद्भवतीति जिज्ञासायामुत्पत्तिप्रकार कथ्यते ।
नोदनादिक्रमेण द्व्यणुकनाशः१, नष्टे द्व्यणुके परमाणवग्निसं-
योगात् श्यामादीनां निवृत्तिः२, निवृत्तेषु श्यामादिषु पुनरन्यस्मा-
दग्निसंयोगाद्रक्तादीनामुत्पत्तिः३ उत्पन्नेषु रक्तादिषु अदृष्टवदात्म-
संयोगात् परमाणौ द्रव्यारम्भणाय क्रिया, तया पूर्वदेशाद्विभागः५,
विभागेन पूर्वदेशसंयोगनिवृत्ति , तस्मिन्निवृत्ते परमाण्वन्तरेण
संयोगोत्पत्तिः७, संयुक्ताभ्यां परमाणुभ्यां द्व्यणुकारम्भ , आरब्धे
द्व्यणुके कारणगुणादिभ्यः कार्यगुणादीनां रूपादीनामुत्पत्ति-
रिति यथाक्रमं नव क्षणा । दशक्षणादिप्रकारान्तरं विस्तरभया-
न्नेह प्रतन्यते । इत्थं पीलुपाकप्रक्रिया । पीठपाकप्रक्रिया तु नैया-
यिकधीसम्मता ॥ १५ ॥
जब द्व्यणुकनाशसे लेकर कितने क्षणमें द्व्यणुकान्तर उत्पन्न होकर रूपवान्
होता है इस जिज्ञासाशान्तिके लिये उत्पत्तिक्रम कहते है-अग्निसंयोगानन्तर क्रिया
पूर्वसंयोगनाशक्रमसे द्व्यणुकका नाश होता है १ द्व्यणुक नाश होनेपर अग्निसंयोग
वश श्यामरूपकी निवृत्ति होती है २ श्यामतानिवृत्तिके अनन्तर पुन अग्निसंयोगसे
रक्तादिरूपोंकी उत्पत्ति होती है ३ रक्तोत्पत्तिके अनन्तर अदृष्टवान् (पुण्यपापयुक्त)
आत्म संयोगसे परमाणुमें द्रव्यारम्भक क्रिया होती है ४ उसी क्रियासे पूर्वदेशसे विभाग
होता है ५ विभागोत्तर पूर्वसंयोगका नाश होता है ६ अनन्तर परमाण्वन्तरसे संयोग
होता है ७ संयुक्तपरमाणुद्वयसे द्व्यणुकका आरम्भ होता है ८ द्व्यणुकोत्पत्तिके अन
न्तरकारण (परमाणु) गुणसे कार्यगुणकी उत्पत्ति होती है ९ एव नव क्षण होते हैं