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सर्वकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 103, कुल 316 में से

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पृष्ठ 103

( ९४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। '[ रामानुज-
अज्ञानत्वाच्छुक्तिकाद्यज्ञानवदिति। ननु शुक्तिकाद्यज्ञानस्याश्र-
यस्य प्रत्यगर्थस्य ज्ञानमात्रस्वभावत्वमेवेति चेन्मैवं शङ्किष्ठाः।
अनुभूतिर्हि स्वसद्भावेनैव कस्यचिद्वस्तुनो व्यवहारानुगुणत्या-
पादकस्वभावाज्ञानावगतिसंविद्वित्त्यादिपरनामा सकर्मकानु-
भवितुरात्मत्वं ज्ञानत्वमित्याश्रयणात् ॥ १५
दोषान्तरभी कहते हैं (दृष्टान्तस्येति) प्रदीपप्रभा अप्रकाशित अर्थ प्रकाशक नहीं
किन्तु ज्ञानही सर्वत्र अर्थ प्रकाशक है इसमें युक्तिभी कहते हैं (सत्यपीति) दीपके
रहते हुएभी ज्ञानके बिना विषयका प्रकाशन नहीं होता साक्षात् अथवा परम्परासे
विषयप्रकाशक मानो तो इन्द्रियमें व्यभिचार भी होगा, क्योंकि इन्द्रिय ज्ञानको उत्पन्न
करता है प्रदीप प्रभाके वलविरोधी अन्धकारको निवारण करती है अत प्रदीप
केवल उपकारक मात्र है । अप्रकाशित अर्थका प्रकाशक नहीं विपरीत अनुमानभी है
अज्ञान ज्ञानस्वरूप ब्रह्मनिष्ठ नहीं होसक्ता । क्योंकि वह अज्ञान है जैसे शुक्तिमें
रजत विषयक अज्ञान ज्ञानस्वरूप ब्रह्मवृत्ति नहीं है वैसेही प्रपञ्च विषयरूप अज्ञानभी
ब्रह्मके आश्रित नहीं होसकता जीवज्ञान स्वरूपमात्र नहीं किन्तु ज्ञाता है अत
अज्ञानका आश्रय ज्ञानस्वरूप नहीं होसक्ता यदि कहो शुक्तिरजतादि अज्ञानका
आधार प्रत्यगर्थ (जीवात्मा) भी ज्ञानस्वरूप है सो नहीं कहसकते क्योंकि अनुभूति
(ज्ञान) स्वसत्तासे किसी वस्तुको व्यवहार योग्यता आपादक ज्ञानादिशब्दवाच्य है
अर्थात् ज्ञान वा संवित्का स्वयंप्रकाश और विषय प्रकाशकत्व स्वभाव है ज्ञानके
बिना विषय प्रकाश नहीं होगा और विषय प्रकाशके बिना हानोपादानादि व्यवहार
भी नहीं होसक्ता । ज्ञान, अवगति, संवित्, अनुभूति यह सब पर्याय शब्द
हैं । ज्ञान निर्विषय न होनेके कारण जो विषयहोगा वह कर्म है अत सकर्मक और
अनुभविता आत्माका धर्म विशेष है अभिप्राय यह है कि संवित् पर्याय ज्ञान सिद्ध
होगा वा नहीं ? यदि सिद्ध होगा तो आकाशके रूपकी समान शून्य होगा । यदि
सिद्धि रही तो सम्बन्ध प्रमाण सविषय होनेसे सकर्मक होगा। यदि कहो संवित्
निर्विषय है तो किसकी वित्ति और किसके प्रति है यह कहना पडेगा क्योंकि वित्ति
प्रकाशरूप है अतः वित्ति किसीके प्रति सिद्धि होती है। यदि आत्माकी वित्ति कहो
तो आत्माका आश्रय सिद्ध होगा औरभी ज्ञानमें विषयादि धर्म हैं या नहीं ? यदि
नहीं हैं, तो शून्यमात्र होगा, यदि विषयादि कहो तो सधर्मकमात्र होगा ॥ १५ ॥