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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

Devanagarihipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

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सन्तति-ग्रन्थ ।

कुछ दिखलायी पढ़ते हैं और बहुत बढ़ने पर आगे तक योनि में लटक आते हैं। ऐसे मस्से भरते और फूटते हैं। उस समय बड़ी पीड़ा होती है। यह छोटे से छोटा चनेके बराबर और बड़े से बड़ा छोटे अमरुद के बराबर होता है। दूसरे तरफ का मस्सा जिल्द से चिपटा रहता है। इसमें रक्त भरा रहता है। कभी एक ही मस्सा होता है, और कभी कई देखे जाने हैं। काले रंग की स्त्रियाँ में यह रोग अधिक होता है। जिनका गर्भ बार बार गिर जाया करता है, उनमें इस रोग की शंका अवश्य होती है। यह रोग प्रायः चालीस वर्ष की अवस्था के लग भग होता है। इसमें स्त्री बन्ध्या हो जाती है।

२२. गर्भाशयका दग्ध हो जाना ।

इसके कई कारण हैं ।

१ थोड़ी अवस्था में बड़ी अवस्थावाले पूरे ज्वान पुरुष से संयोग करने पर ।

२ गर्भाशय में संक्रामक रोगों का असर पहुंचने में । इस रोग में अनेक लक्षण प्रकट होने हैं ।

१ द्वाव पड़ने के कारण नर्सों का फट जाना ।

२ मासिक धर्म के समय रक्त अधिक निकलना ।

३ अतुष्टधर्म के समय के अनिरक्त और समर्यों में भी रक्त निकलना या आठ दिनदितक बराबर ज्वर का होना ।

ऐसे रोग में द्वाव के कारण नालियों के फट जाने में प्रायः रक्त निकला करता है और ऐसी स्थिति में गर्भ नहीं उतरता ।

२३. गर्भाशयमें रक्तका जमकर भस्त्र जाना ।

इसके कई कारण हैं ।

१. गर्भाशय में टंडक का पहुंचना और मुख में रक्तावृत होना ।